जॉर्ज विलियम ट्रेल (1816–1835 ई.)

परिचय

जॉर्ज विलियम ट्रेल ब्रिटिश कुमाऊँ के सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक कमिश्नरों में से एक था। एडवर्ड गार्डनर के नेपाल में कंपनी के राजनीतिक एजेंट नियुक्त होने के बाद ट्रेल ने अप्रैल 1816 से जुलाई 1817 तक कार्यवाहक कमिश्नर के रूप में कार्य किया और जुलाई 1817 से अक्टूबर 1835 तक ब्रिटिश कुमाऊँ के कमिश्नर के रूप में रहा। उसके लगभग दो दशकों के कार्यकाल में कुमाऊँ की राजस्व, न्याय, पुलिस, भूमि-बंदोबस्त, संचार तथा प्रशासनिक व्यवस्था में अनेक परिवर्तन हुए। ब्रिटिश शासन की वास्तविक प्रशासनिक आधारशिला मजबूत करने के कारण ट्रेल को “कुमाऊँ में ब्रिटिश शासन का वास्तविक संस्थापक” माना जाता है।

जॉर्ज विलियम ट्रेल के प्रमुख कार्य एवं प्रशासनिक सुधार

  • 13 अप्रैल 1816 को एडवर्ड गार्डनर को नेपाल में कंपनी का राजनीतिक एजेंट नियुक्त कर दिया गया। इसके बाद ट्रेल ने अप्रैल 1816 से जुलाई 1817 तक कार्यवाहक कमिश्नर के रूप में कुमाऊँ का प्रशासन संभाला।
  • जुलाई 1817 से अक्टूबर 1835 तक ट्रेल ने ब्रिटिश कुमाऊँ के कमिश्नर के रूप में कार्य किया। इस प्रकार वह ब्रिटिश कुमाऊँ का दूसरा कमिश्नर था।
  • ट्रेल को कुमाऊँ का प्रथम वास्तविक कमिश्नर माना जाता है, क्योंकि उसके कार्यकाल में ब्रिटिश शासन की प्रशासनिक आधारशिला वास्तविक रूप से मजबूत हुई।
  • इसी कारण जॉर्ज विलियम ट्रेल को कुमाऊँ में ब्रिटिश शासन का वास्तविक संस्थापक भी कहा जाता है।
  • ट्रेल ने कुमाऊँ को 26 परगनों में विभाजित किया।
  • प्रशासनिक सीमा को लेकर ट्रेल और मुरादाबाद के कलेक्टर हॉल हेड के बीच विवाद हुआ, जिसका निस्तारण 1825 ई. में बोल्डसरन द्वारा किया गया।
  • ट्रेल अपने स्तर पर नियम एवं कानून बनाकर उन्हीं के अनुसार प्रशासन चलाता था। वह उच्च स्तर पर बनाए गए सभी कानूनों को न तो पूरी तरह जानता था और न ही हमेशा उनका पालन करता था। इसी कारण उसके जाने के बाद कुमाऊँ में स्थायी एवं व्यवस्थित कानूनों का अभाव महसूस किया गया।
  • ट्रेल के समय सरकारी स्तर पर शीघ्र निर्णय लिए जाते थे। उसके प्रशासन के संबंध में प्रसिद्ध उक्ति “न वकील, न अपील, न दलील” प्रचलित थी।
  • इतिहासकार एटकिंसन ने ट्रेल के शासन को “माँ-बाप सरकार, सख्त तथा तंत्री” के रूप में वर्णित किया है।
  • ट्रेल ने ‘Statistical Sketch of Kumaon’ (स्ट्रैटिस्टिकल स्केच ऑफ कुमाऊँ) नामक पुस्तक लिखी।
  • ट्रेल ने हरिद्वार से बद्रीनाथ और केदारनाथ जाने वाली सड़क के निर्माण का कार्य प्रारंभ कराया तथा इसके सर्वेक्षण में स्वयं रुचि ली।
  • बद्रीनाथ एवं केदारनाथ के लिए सड़क निर्माण में विशेष रुचि लेने के कारण ट्रेल पर ईसाई होते हुए भी हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया था।
  • 1816 ई. में अल्मोड़ा तथा 1821 ई. में पौड़ी में जेलों की स्थापना ट्रेल के काल में हुई।
  • 1816 ई. में ट्रेल ने लिखा कि कुमाऊँ में अपराधों की संख्या कम होने के कारण अलग से फौजदारी पुलिस की आवश्यकता नहीं है।
  • चंद शासकों के समय से ही कानूनगो पद का अस्तित्व था।
  • 1819 ई. में 9 पटवारी पद सृजित किए गए। पटवारी राजस्व संबंधी कार्यों के साथ-साथ पुलिस संबंधी कार्य भी करता था।
  • पटवारी को राजस्व तथा पुलिस दोनों कार्य सौंपे जाने के कारण ट्रेल को उत्तराखण्ड में राजस्व पुलिस व्यवस्था का जनक कहा जाता है।
  • 1820 ई. में ट्रेल ने न्यायालय शुल्क के लिए 8 आने का टिकट तथा स्टाम्प पेपर जारी किए।
  • ट्रेल के समय गोवध की अनुमति दिए जाने का उल्लेख मिलता है। इसका हिंदू समाज के एक वर्ग ने विरोध किया।
  • हिंदुओं के विरोध के संबंध में ट्रेल की कठोर टिप्पणी का उल्लेख ईसाई मिशनरी जेम्स कैनेडी की पुस्तक Life and Work in Benares and Kumaon में मिलता है।
  • 1822 ई. में कुमाऊँ में आबकारी विभाग की स्थापना की गई।
  • 1822 ई. में कुली-बेगार के विकल्प के रूप में खच्चर सेना की स्थापना की गई। इसका गठन अंग्रेज अधिकारी ग्लिन के सुझाव पर ट्रेल द्वारा किया गया था।
  • 1824 ई. में सरकारी खजाने की सुरक्षा एवं नियंत्रण के लिए डबल लॉक व्यवस्था लागू की गई। इसमें खजाने की एक चाबी कलेक्टर तथा दूसरी ट्रेजरर के पास रहती थी।
  • 1824 ई. में कुमाऊँ में दास-दासी के क्रय-विक्रय की प्रथा समाप्त कर दी गई।
  • 1829–30 ई. में ट्रेल ने नदियों पर लोहे के सस्पेंशन पुलों का निर्माण करवाया।
  • 1833 ई. में अल्मोड़ा में एक देशी चिकित्सक की नियुक्ति की गई।
  • 1835 ई. में ट्रेल ने रुद्रप्रयाग–केदारनाथ, ऊखीमठ–चमोली तथा कर्णप्रयाग–चाँदपुर गढ़ी तक सड़क निर्माण करवाया।
  • 1 दिसंबर 1835 ई. को ट्रेल सेवानिवृत्त हो गया।
  • ट्रेल के बाद 30 नवंबर 1835 से 6 अप्रैल 1836 तक मोसले स्मिथ ने कमिश्नर का कार्यभार संभाला।
  • 1816 ई. में कुमाऊँ कमिश्नरी को फर्रुखाबाद में स्थापित बोर्ड ऑफ कमिश्नर्स के अधीन कर दिया गया।
  • 1817 ई. में कुमाऊँ में रेगुलेशन X लागू किया गया। इसके अंतर्गत कमिश्नर को हत्या और डकैती को छोड़कर अधिकांश मुकदमों का निपटारा करने का अधिकार प्राप्त था।
  • 1817 ई. में जार/उपपति प्रथा के अंतर्गत होने वाली हत्याओं को अपराध घोषित किया गया। इस प्रथा में किसी विवाहित महिला के दूसरे पुरुष के साथ चले जाने पर उसके पति या समाज द्वारा उसकी हत्या को सामाजिक मान्यता प्राप्त थी। ट्रेल ने ऐसी हत्याओं को अपराध घोषित किया और कठोर दंड का प्रावधान किया।
  • ट्रेल ने पत्नी की बिक्री तथा विधवा को उसके पति के परिवार द्वारा बेचने की प्रथा को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाए।
  • 1824 ई. में विशप हेबर (Bishop Heber) के कुमाऊँ आगमन के समय उन्होंने यहाँ चाय की खेती की संभावनाओं का उल्लेख किया।
  • 1826 ई. में साल के वृक्षों को काटने पर प्रतिबंध लगाया गया।
  • 1828 ई. में जन्म, मृत्यु एवं विवाह के पंजीकरण की प्रथा प्रारंभ की गई।
  • ट्रेल पास की खोज/पहचान का संबंध जॉर्ज विलियम ट्रेल से जोड़ा जाता है। यह मार्ग पिंडारी ग्लेशियर और मिलम ग्लेशियर क्षेत्र को जोड़ने वाले उच्च हिमालयी मार्गों में माना जाता है।
  • ट्रेल पास के अभियान में ट्रेल की सहायता मल्खा सिंह ने की थी।
  • लता बिष्ट को ट्रेल दर्रा पार करने वाली विश्व की पहली महिला के रूप में बताया जाता है।
  • ट्रेल के कार्यकाल में कुमाऊँ में कई भूमि-बंदोबस्त करवाए गए। इसी कारण उसे सर्वाधिक भूमि-बंदोबस्त कराने वाले कमिश्नरों में प्रमुख माना जाता है।
  • ब्रिटिश गढ़वाल का प्रथम भू-बंदोबस्त ट्रेल द्वारा करवाया गया।
  • 1823 ई. का पंचशाला भूमि-बंदोबस्त संवत् 1880 से संबंधित होने के कारण ‘अस्सी साला भूमि-बंदोबस्त’ के नाम से भी जाना जाता है। इसे आदर्श एवं न्यायपूर्ण बंदोबस्त माना जाता है।
  • इस बंदोबस्त में गाँवों की सीमाएँ निर्धारित की गईं, जिससे दो गाँवों के बीच सीमा संबंधी विवादों में कमी आई।
  • 1837 ई. में कुमाऊँ की शासन-पद्धति की जाँच के लिए बर्ड महोदय को भेजा गया। उसने अपनी रिपोर्ट में ट्रेल तथा गोयन/गोबान के शासन की आलोचना की।
  • ट्रेल के शासनकाल से कुमाऊँ में विवादों के निपटारे के लिए साक्ष्य एवं गवाहों की मांग का प्रचलन बढ़ा।
  • 1826 ई. में देहरादून एवं चंडी क्षेत्र को कुमाऊँ में शामिल किया गया। देहरादून 1 मई 1829 तक कुमाऊँ प्रांत का हिस्सा रहा।
  • 1825–26 ई. में शोर (Shore) को ट्रेल का सहायक नियुक्त किया गया।
  • 1824 ई. में रवाई परगना टिहरी रियासत में शामिल किया गया।
  • नौगाँव, पुरोला एवं मोरी के संयुक्त क्षेत्र को रवाई क्षेत्र कहा जाता है।
  • 1823 ई. में टिहरी गढ़वाल के प्रथम भूमि-बंदोबस्त के समय राजा सुदर्शन शाह को ज्ञात हुआ कि उसके कुछ क्षेत्र अंग्रेजों के अधिकार में चले गए हैं। इसके बाद ट्रेल ने 1824 ई. में रवाई परगना सुदर्शन शाह को वापस कर दिया।
  • ट्रेल ने 1815 ई. में गढ़वाल क्षेत्र में श्रीनगर तथा चाँदपुर तहसीलों की स्थापना की।
  • 1834 ई. में हल्दूवणी को ‘हल्द्वानी’ नाम दिए जाने का उल्लेख मिलता है। आधुनिक हल्द्वानी के विकास में ट्रेल की महत्वपूर्ण भूमिका के कारण उसे आधुनिक हल्द्वानी का निर्माता भी कहा जाता है।
  • ट्रेल के शासनकाल में ब्रिटिश गढ़वाल का पहला थाना कोटद्वार में स्थापित किया गया।

निष्कर्ष

जॉर्ज विलियम ट्रेल का कार्यकाल ब्रिटिश उत्तराखण्ड के प्रशासनिक इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उसने कुमाऊँ में राजस्व, भूमि-बंदोबस्त, न्याय, पुलिस, जेल, डाक, सड़क, पुल, कोषागार तथा सामाजिक प्रशासन को व्यवस्थित करने का प्रयास किया। 1819 में पटवारी व्यवस्था, 1820 में कोर्ट फीस, 1822 में आबकारी विभाग एवं खच्चर सेना, 1824 में डबल लॉक व्यवस्था तथा दास-दासी प्रथा का अंत और 1828 में जन्म-मृत्यु-विवाह पंजीकरण जैसे कदम उसके प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ थे। भूमि-बंदोबस्त और राजस्व पुलिस व्यवस्था के विकास में भी उसका महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसी व्यापक प्रशासनिक भूमिका के कारण ट्रेल को कुमाऊँ में ब्रिटिश शासन का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

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