कुमाऊँ में गोरखा सुब्बा
परिचय
1790 ई. में कुमाऊँ पर गोरखों का अधिकार स्थापित होने के बाद उन्होंने यहाँ अपनी प्रशासनिक व्यवस्था लागू की। कुमाऊँ का शासन संचालित करने के लिए नेपाल दरबार द्वारा सुब्बा (सूबेदार) नियुक्त किए जाते थे। सुब्बा को प्रशासन, राजस्व, न्याय तथा सैन्य मामलों में व्यापक अधिकार प्राप्त थे। गोरखा शासन के दौरान कुमाऊँ में समय-समय पर अनेक सुब्बाओं की नियुक्ति हुई। इनके काल में भूमि बंदोबस्त, नए करों की व्यवस्था तथा प्रशासनिक नियंत्रण को मजबूत करने के प्रयास किए गए। गोरखा शासन के अंतिम चरण में बामशाह कुमाऊँ के सुब्बा रहे और 1815 ई. में गोरखा शासन की समाप्ति तक इस पद पर बने रहे।
कुमाऊँ के गोरखा सुब्बा
- कुमाऊँ पर गोरखों के अधिकार के बाद प्रथम सुब्बा जोगा मल्ल शाह को नियुक्त किया गया। उनका कार्यकाल लगभग 1791–1792 ई. माना जाता है
- जोगा मल्ल शाह का बंदोबस्त कुमाऊँ में गोरखा शासन की प्रारंभिक राजस्व व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण था। उन्होंने कुमाऊँ में पहला भूमि बंदोबस्त करवाया।
- जोगा मल्ल शाह के समय प्रत्येक बालिग व्यक्ति से 1 रुपया राजकर (Poll Tax) लिया जाता था।
- उन्होंने 20 नाली भूमि पर 1 रुपया कर निर्धारित किया। इस कर को ‘बीसी’ के नाम से जाना जाता था।
- दफ्तर के खर्च की पूर्ति के लिए प्रत्येक गाँव पर ‘सुवांग दस्तूर’ नामक राजकर लगाया गया।
- ‘घुरही-पिछही’ नाम से दो रुपये वार्षिक शुल्क पर मवासे ठहराए जाने का उल्लेख मिलता है।
- कुमाऊँ का दूसरा सुब्बा काजी नरशाही को बनाया गया। उसके समय मंगलवार रात्रि कांड होने का उल्लेख मिलता है। इससे संबंधित कहावत है— “मंगल की रात और नरशाही का पाला है।”
- कुमाऊँ का तीसरा गोरखा सुब्बा अजब सिंह खवास था। उसके समय अल्मोड़ा के लगभग 1,500 ग्राम प्रधानों के सामूहिक नरसंहार का उल्लेख मिलता है।
- इसके बाद अमर सिंह थापा को चौथा तथा प्रबल राणा को पाँचवाँ सुब्बा बनाया गया।
- कुमाऊँ का छठा सुब्बा बामशाह था, जिसका कार्यकाल लगभग 1797–1799 ई. माना जाता है। उसके समय ब्राह्मणों पर ‘कुशही’ नामक कर लगाया गया।
- कुशही कर का उद्देश्य उन ब्राह्मणों पर दबाव बनाना बताया जाता है, जिनके संबंध में षड्यंत्र या राजद्रोह में भाग लेने की आशंका रहती थी।
- इसके बाद अजब सिंह खवास को दूसरी बार कुमाऊँ का सुब्बा बनाया गया। उससे संबंधित एक प्रसिद्ध कथन है— “ब्राह्मणों के पैर पूजे जाते हैं, सिर नहीं; इसलिए बोझा सिर पर रखो।”
- कुमाऊँ का आठवाँ सुब्बा धौकल सिंह बसन्यात बना।
- 1802 ई. में धौकल सिंह बसन्यात के स्थान पर नेपाली सेनापति रुद्रवीर शाह को सुब्बा नियुक्त किया गया। उसके समय ‘टनकर’ नामक नया कर लगाए जाने का उल्लेख मिलता है।
- 1803 ई. में कुमाऊँ का सुब्बा काजी गजशेखर/गजकेशर पांडे था।
- 1806 ई. में सुबेदार ऋतुराज थापा को किसी कारण से दोषी ठहराए जाने के बाद डोटी में फाँसी दी गई।
- ऋतुराज थापा के बाद चौतरिया बामशाह को कुमाऊँ का सुब्बा बनाया गया। वह 1815 ई. तक इस पद पर रहा।
- बामशाह कुमाऊँ का अंतिम गोरखा सुब्बा माना जाता है। 1815 ई. में गोरखा शासन की समाप्ति के साथ कुमाऊँ में सुब्बा व्यवस्था का भी अंत हो गया।
निष्कर्ष
कुमाऊँ में गोरखा शासन के दौरान सुब्बा प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी था। नेपाल दरबार द्वारा नियुक्त सुब्बा को राजस्व, प्रशासन, न्याय और सैन्य मामलों में व्यापक अधिकार प्राप्त थे। जोगा मल्ल शाह के भूमि बंदोबस्त से प्रारंभ हुई राजस्व व्यवस्था में बीसी, सुवांग दस्तूर, घुरही-पिछही और बाद में कुशही जैसे विभिन्न करों का प्रयोग किया गया। विभिन्न सुब्बाओं के कार्यकाल में प्रशासनिक नियंत्रण के साथ-साथ कठोर कर-वसूली और दमन की घटनाएँ भी सामने आईं। बामशाह, जो अंतिम गोरखा सुब्बा था, के समय 1815 ई. में अंग्रेजों ने कुमाऊँ पर अधिकार कर लिया और लगभग 25 वर्षों के गोरखा शासन का अंत हो गया। इस प्रकार सुब्बा व्यवस्था कुमाऊँ में गोरखा प्रशासन की प्रमुख पहचान थी।