गढ़वाल के प्रशासक / सुब्बा
परिचय
गोरखों ने 1804 ई. में गढ़वाल पर अपना अधिकार स्थापित करने के बाद यहाँ अपनी प्रशासनिक व्यवस्था लागू की। गढ़वाल में शासन संचालन के लिए नेपाल दरबार की ओर से विभिन्न सुब्बा, चौतरिया, काजी एवं अन्य उच्च अधिकारियों की नियुक्ति की गई। इन प्रशासकों का मुख्य उद्देश्य राजस्व वसूली, कानून-व्यवस्था, कृषि व्यवस्था तथा प्रशासनिक नियंत्रण बनाए रखना था। अलग-अलग प्रशासकों के शासनकाल में गढ़वाल की प्रशासनिक स्थिति में उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। कुछ अधिकारियों ने कृषि एवं राजस्व व्यवस्था में सुधार का प्रयास किया, जबकि कुछ के शासनकाल में प्रजा पर अत्याचार और शोषण बढ़ गया। 1812 से 1815 ई. तक अमर सिंह थापा के प्रतिनिधियों अर्थात् आमिलों ने गढ़वाल का प्रशासन संभाला।
प्रमुख प्रशासक / सुब्बा
1. अमर सिंह थापा
- अमर सिंह थापा गढ़वाल का पहला प्रमुख प्रशासक था।
- वह कुमाऊँ एवं गढ़वाल के लिए नेपाल दरबार द्वारा भेजा गया सर्वोच्च पदाधिकारी था।
- नेपाल सरकार ने उसे ‘काजी’ की उपाधि प्रदान की थी।
- काजी नेपाल द्वारा प्रदान की जाने वाली सर्वोच्च प्रशासनिक उपाधियों में से एक थी।
2. रणजोर सिंह थापा (1804–1805 ई.)
- रणजोर सिंह थापा दयालु एवं सरल स्वभाव का प्रशासक था।
- वह विद्वानों का सम्मान करता था।
- उसने कवि मौलाराम पर विशेष कृपा की थी। इससे प्रसन्न होकर मौलाराम ने रणजोर सिंह थापा को ‘दानवीर कर्ण’ की उपाधि दी।
- शासन की सुव्यवस्था के लिए उसने एक सभा-मंडली का गठन किया। यह सभा राज्य की समस्याओं पर विचार-विमर्श कर उचित मार्गदर्शन प्रदान करती थी।
- उसके शासनकाल में दून उपत्यका में कठोरता बढ़ी। महंत हर सेवक को कढ़ाई-दीप की परीक्षा से गुजरना पड़ा और निरपराध होने के बावजूद उसे बड़ी धनराशि दंड के रूप में देनी पड़ी।
- गोरखों के भय से नीति घाटी के भोटान्तिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया।
- गढ़वाल में नियुक्त उच्चाधिकारी हिमाचल प्रदेश की विजय तथा कांगड़ा दुर्ग के घेरे में व्यस्त रहते थे। इसलिए गढ़वाल का दैनिक राजकाज संभालने के लिए रणजोर सिंह थापा ने विचारी (न्यायाधीश) तथा अचारी (अधिशासक) पदों का सृजन किया।
3. हस्तीदल चौतरिया (1805–1808 ई.)
- हस्तीदल चौतरिया शांत प्रकृति का शासक था।
- उसे कृषकों के प्रति विशेष सहानुभूति थी तथा उसने कृषकों के उत्थान के लिए अनेक प्रयास किए।
- उसने दून उपत्यका में सुव्यवस्था स्थापित की और रणजोर सिंह थापा के समय में बंजर हो चुकी दून घाटी को पुनः हरा-भरा बनाने का प्रयास किया।
- उसके शासनकाल में गुरु रामराय मंदिर के महंत हर सेवक को उनकी प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त हुई।
- गोरखों द्वारा लुटेरों के विरुद्ध की गई कठोर कार्रवाई के कारण दून घाटी में लूटमार पर काफी हद तक नियंत्रण स्थापित हुआ और शांति स्थापित हुई।
- उसने कृषकों के कल्याण के लिए विशेष प्रयास किए।
- कृषि की उन्नति के लिए किसानों को तकावी ऋण देने की व्यवस्था की गई।
- किसानों पर लगान की दर कम की गई।
- उसकी उदार प्रकृति के बावजूद दास प्रथा में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया और हरिद्वार दासों के क्रय-विक्रय का प्रमुख केंद्र बना रहा।
- रेपर का गढ़वाल राज्य में आगमन हस्तीदल चौतरिया के शासनकाल में हुआ।
- कांगड़ा दुर्ग विजय अभियान में असफलता के कारण नेपाल सरकार ने हस्तीदल चौतरिया को पदच्युत कर दिया।
4. भैरों थापा (1808–1811 ई.)
- भैरों थापा अत्याचारी, विलासी एवं क्रूर प्रशासक के रूप में जाना जाता है।
- जब भैरों थापा कांगड़ा अभियान पर गया हुआ था, तब उसके अधीनस्थ अधिकारियों ने प्रजा पर अत्याचार किए।
- भैरों थापा के शासनकाल में प्रजा पर होने वाले अत्याचारों की जानकारी मौलाराम ने नेपाली सरकार को दी।
- इसका प्रतिकूल प्रभाव स्वयं मौलाराम पर पड़ा। चौतरिया के शासनकाल में ‘रणबहादुर चंद्रिका’ की रचना के लिए नेपाल सरकार द्वारा मौलाराम को दी गई जागीरें वापस ले ली गईं।
- उसके शासनकाल में कंपनी के साथ भांग एवं लीसे के व्यापार से काफी लाभ कमाया जाता था।
5. काजी बहादुर भंडारी (1811–1812 ई.)
- भू-राजस्व व्यवस्था में अव्यवस्था के कारण नेपाल सरकार ने काजी बहादुर भंडारी को प्रबंध एवं सुव्यवस्था स्थापित करने के लिए गढ़वाल भेजा।
- बहादुर भंडारी के अधीन दशरथ खत्री, सूबेदार अजब भंडारी, कृष्णानंद खंडूरी तथा बागदार खत्री आदि अधिकारियों को भूमि संबंधी सुधार के लिए नियुक्त किया गया।
- भू-व्यवस्था में कई परिवर्तन किए गए।
- भूमि की उर्वरता को ध्यान में रखते हुए गढ़वाल की भूमि को पाँच भागों में विभाजित किया गया—अबल, दम, सोम, चाहर तथा सूंखबासी।
- इन श्रेणियों के आधार पर भूमि की उर्वरता एवं राजस्व निर्धारण की व्यवस्था की गई।
- हालांकि ये सुधार व्यवहारिक स्तर पर पूरी तरह लागू नहीं हो सके और भूमि संबंधी शोषण पहले की तरह जारी रहा।
6. अमर सिंह थापा के प्रतिनिधि / आमिल (1812–1815 ई.)
- 1812 से 1815 ई. के बीच गढ़वाल का प्रशासन अमर सिंह थापा के प्रतिनिधियों अर्थात् आमिलों के हाथों में रहा।
- इस अवधि में प्रशासन का मुख्य उद्देश्य राजस्व वसूली तथा गोरखा शासन को सुदृढ़ बनाए रखना था।
- आमिलों के माध्यम से नेपाल दरबार गढ़वाल के प्रशासन एवं राजस्व व्यवस्था पर अपना नियंत्रण बनाए रखता था।
- यह व्यवस्था गढ़वाल में गोरखा शासन के अंतिम चरण तक जारी रही।
- 1815 ई. में अंग्रेजों और गोरखों के बीच हुए युद्ध में गोरखों की पराजय के बाद गढ़वाल में गोरखा शासन का अंत हो गया और प्रशासनिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया।
निष्कर्ष
गढ़वाल में गोरखा शासन के दौरान नियुक्त प्रशासकों की कार्यशैली एक समान नहीं थी। रणजोर सिंह थापा ने प्रशासनिक व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए सभा-मंडली तथा विचारी-अचारी जैसे पदों की व्यवस्था की, जबकि हस्तीदल चौतरिया ने कृषकों के हित में तकावी ऋण तथा लगान में कमी जैसे कदम उठाए। इसके विपरीत भैरों थापा के समय अत्याचार और प्रशासनिक कठोरता बढ़ी। काजी बहादुर भंडारी ने भू-राजस्व व्यवस्था में सुधार का प्रयास किया तथा भूमि को उसकी उर्वरता के आधार पर वर्गीकृत किया। अंततः 1812–1815 ई. में आमिलों के माध्यम से प्रशासन संचालित हुआ। इस प्रकार गोरखा काल में प्रशासन मुख्यतः राजस्व, सैन्य नियंत्रण और केंद्रीकृत शासन पर आधारित था।