गोरखा न्याय प्रशासन

परिचय

गोरखा शासन मूलतः सैन्य प्रशासन पर आधारित था, इसलिए उसकी न्याय व्यवस्था पर भी सैन्य व्यवस्था का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। न्यायिक मामलों की सुनवाई विचारी नामक अधिकारी करता था, जिसे अपने कार्य में व्यापक अधिकार प्राप्त थे। विवादों का समाधान प्रायः मौखिक पूछताछ, साक्षियों और समझौते के माध्यम से किया जाता था। साक्ष्यों के अभाव में दिव्य प्रणाली द्वारा न्याय करने की प्रथा भी प्रचलित थी। दूसरी ओर, अपराधों के लिए कठोर शारीरिक एवं आर्थिक दंड दिए जाते थे और न्यायाधीश के पास व्यापक अधिकार होने के कारण यह व्यवस्था कई मामलों में निरंकुश, अन्यायपूर्ण और अतार्किक भी मानी जाती है।

गोरखा न्याय प्रशासन प्रमुख तथ्य

  • गोरखा प्रशासन सैनिक प्रशासन था। इसलिए उसकी न्याय व्यवस्था भी सैनिक स्वरूप की थी।
  • न्यायिक मामलों की सुनवाई ‘विचारी’ नामक अधिकारी द्वारा की जाती थी। विचारी की सहायता के लिए सेना उपलब्ध रहती थी।
  • विचारी को न्यायिक मामलों में व्यापक अधिकार प्राप्त थे और वह काफी हद तक निरंकुश था। उसके ऊपर राजा के प्रत्यक्ष नियंत्रण की कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं थी।
  • विवादों के कारणों का पता लगाने के लिए मौखिक पूछताछ की जाती थी।
  • साक्षियों को हरवंश की पौथी की शपथ दिलाई जाती थी।
  • विवादों को आपसी समझौते के माध्यम से समाप्त करने को महत्व दिया जाता था।
  • न्यायिक प्रक्रिया में सामान्यतः अधिक विलंब नहीं होता था तथा फौजदारी विवादों में दस्तावेज प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं माना जाता था।
  • साक्ष्यों के अभाव में दिव्य प्रणाली के माध्यम से न्याय करने की प्रथा भी प्रचलित थी।
  • गोरखा न्याय व्यवस्था में निम्नलिखित प्रमुख दिव्य प्रचलित थे—
    • (क) गोला दिप — वादी और प्रतिवादी को हाथों में गर्म लोहे की सलाखें पकड़कर कुछ दूरी तक चलना पड़ता था। जिसका हाथ जल जाता, उसे दोषी माना जाता था।
    • (ख) तराजू दिप — व्यक्ति को पत्थरों से तौला जाता और उन पत्थरों को सुरक्षित रख लिया जाता। अगले दिन उसी व्यक्ति को उन्हीं पत्थरों से पुनः तौला जाता। यदि उसका वजन पहले की अपेक्षा अधिक होता तो उसे निर्दोष माना जाता, अन्यथा दोषी।
    • (ग) कढ़ाई दिप — व्यक्ति को गर्म तेल में हाथ डालने पड़ते थे। हाथ जल जाने पर दोषी तथा सुरक्षित रहने पर निर्दोष माना जाता था।
    • (घ) जल दिप — वादी और प्रतिवादी के बच्चों को जल या तालाब में डुबोया जाता था। जिसकी संतान देर से डूबती, उसे निर्दोष माना जाता था।
    • (ङ) जहर दिप — वादी और प्रतिवादी को विष दिया जाता था। जो जीवित रहता, उसे निर्दोष माना जाता था।
    • (च) मंदिर दिप — वादी और प्रतिवादी के नाम कागज के टुकड़ों पर लिखकर मंदिर में देवता की मूर्ति के सामने रखे जाते थे। पुजारी जिस पर्ची को पहले उठाता, उसमें जिसका नाम होता, उसे निर्दोष माना जाता था।
  • गोरखा राज्य में अपराधियों को कठोर दंड देने की परंपरा थी। दंड मुख्यतः आर्थिक और शारीरिक दोनों प्रकार के होते थे।
  • मृत्युदंड सबसे कठोर दंड माना जाता था। कुछ मामलों में अपराधी भारी अर्थदंड देकर मृत्युदंड से बच सकता था।
  • चोरी जैसे अपराधों के लिए अंग काटने जैसी कठोर शारीरिक दंड-प्रथाएँ भी प्रचलित थीं।
  • राजद्रोह और गोहत्या को गंभीर अपराध माना जाता था और इनके लिए मृत्युदंड का प्रावधान था।
  • निम्न जाति के व्यक्ति द्वारा किसी उच्च जाति के ब्राह्मण या राजपूत के हुक्के से तंबाकू पीना भी गंभीर अपराध माना जाता था और इसके लिए कठोर दंड का प्रावधान था।
  • व्यभिचार को भी गंभीर अपराध माना जाता था और इसके लिए कठोर दंड दिए जाते थे।
  • अपने से उच्च जाति की स्त्री के साथ व्यभिचार करने पर मृत्युदंड का प्रावधान था, जबकि व्यभिचारी स्त्री को नाक काटने जैसी कठोर सजा दी जाती थी।
  • सामान्य व्यभिचार के मामलों में अर्थदंड लिया जाता था।
  • इस प्रकार गोरखा न्याय व्यवस्था में प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल और त्वरित थी, लेकिन दंड व्यवस्था अत्यंत कठोर थी तथा जातिगत भेदभाव और अंधविश्वास पर आधारित अनेक प्रथाएँ इसमें शामिल थीं।
  • न्याय व्यवस्था में विचारी की व्यापक शक्तियों के कारण न्याय काफी हद तक न्यायाधीश की इच्छा और निर्णय पर निर्भर करता था।

निष्कर्ष

गोरखा काल की न्याय व्यवस्था को उसके सैन्य एवं केंद्रीकृत प्रशासन के संदर्भ में समझा जा सकता है। विचारी को न्यायिक मामलों में व्यापक अधिकार प्राप्त थे और मौखिक पूछताछ, शपथ तथा समझौते के माध्यम से विवादों का शीघ्र निपटारा किया जाता था। साक्ष्यों के अभाव में विभिन्न दिव्य प्रणालियों का प्रयोग किया जाता था, जो आधुनिक न्याय के दृष्टिकोण से अवैज्ञानिक और अतार्किक थीं। अपराधों के लिए आर्थिक दंड के साथ-साथ अत्यंत कठोर शारीरिक दंड और मृत्युदंड का भी प्रचलन था। इसलिए गोरखा न्याय प्रणाली में त्वरित न्याय की विशेषता तो दिखाई देती है, लेकिन इसकी निरंकुशता, कठोर दंड, जातिगत भेदभाव और दिव्य न्याय जैसी प्रथाएँ इसे आधुनिक दृष्टि से अन्यायपूर्ण बनाती हैं।

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