टिहरी रियासत की भू-व्यवस्था
परिचय
टिहरी रियासत की भू-व्यवस्था में राजा का सर्वोच्च भूमि-अधिकार प्रमुख विशेषता थी। राज्य की समस्त भूमि पर टिहरी नरेशों का पूर्ण सत्व माना जाता था। कृषि भूमि पर खेती करने वाले व्यक्तियों को आसामी कहा जाता था और उनकी स्थिति के आधार पर उन्हें मौरूसीदार, खायकर एवं सिरतान तीन वर्गों में विभाजित किया गया था। भूमि के उपयोग, राजस्व भुगतान तथा कृषकों के अधिकारों को इस व्यवस्था के माध्यम से नियंत्रित किया जाता था। साथ ही, कृषकों को कृषि भूमि बेचने का अधिकार नहीं था, जिससे गाँव की कृषि भूमि को गाँव के निवासियों के पास बनाए रखने का प्रयास किया गया।
प्रमुख विशेषताये
1. भूमि पर राजा का अधिकार
- टिहरी रियासत में राज्य की समस्त भूमि का पूर्ण सत्व टिहरी नरेशों में निहित माना जाता था।
- राज्य के गाँवों में राजाज्ञा से जिस व्यक्ति को कृषि भूमि पर खेती करने का अधिकार प्राप्त होता था, उसे ‘आसामी’ कहा जाता था।
- कृषि भूमि के अंतर्गत केवल खेती की जाने वाली भूमि ही नहीं, बल्कि वह भूमि भी शामिल थी जिस पर कृषि कार्य के लिए मकान एवं पशुओं की छानियाँ बनी होती थी
2. आसामी के प्रकार
- टिहरी रियासत में आसामियों को मुख्यतः तीन वर्गों में विभाजित किया गया था—
- (i) मौरूसीदार
- मौरूसीदार वह व्यक्ति था जो राजाज्ञा से भूमि को बिना किसी दूसरे की अधीनता के स्वयं कमाता/कृषि करता था।
- मौरूसीदार सीधे टिहरी नरेश को राजस्व देता था।
- (ii) खायकर
- खायकर वह कृषक था जो मौरूसीदार के अधीन उसकी भूमि पर खेती करता था।
- खायकर अपनी कृषि भूमि के बदले मौरूसीदार को निर्धारित रकम देता था।
- (iii) सिरतान
- सिरतान वह कृषक था जो मौरूसीदार अथवा खायकर की भूमि पर कृषि करता था और उसके बदले उसे ‘सिरती’ अथवा नकद रकम देता था।
3. भूमि विक्रय पर प्रतिबंध
- टिहरी रियासत में कृषकों को कृषि भूमि बेचने का अधिकार नहीं था।
- भूमि विक्रय पर प्रतिबंध का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि गाँव की कृषि भूमि गाँव के लोगों के पास ही बनी रहे।
- यहाँ तक कि ऋण की वसूली के लिए भी कृषि भूमि की बिक्री नहीं की जा सकती थी।
निष्कर्ष
टिहरी रियासत की भू-व्यवस्था राजा के सर्वोच्च भूमि-अधिकार और कृषकों की निर्धारित श्रेणियों पर आधारित थी। राजाज्ञा से कृषि भूमि पर खेती करने वाले आसामियों को मौरूसीदार, खायकर और सिरतान के रूप में विभाजित किया गया था। इनमें मौरूसीदार की स्थिति अपेक्षाकृत स्वतंत्र, जबकि खायकर और सिरतान अधीनस्थ कृषक थे। भूमि के विक्रय पर प्रतिबंध इस व्यवस्था की महत्वपूर्ण विशेषता थी। विशेष रूप से ऋण की वसूली के लिए भी कृषि भूमि बेचने की अनुमति न होना गाँव की कृषि भूमि को बाहरी हस्तांतरण से बचाने का महत्वपूर्ण प्रावधान था।