चंद प्रांतीय प्रशासन

परिचय

चंद राजाओं ने कुमाऊँ क्षेत्र में एक क्रमबद्ध एवं बहुस्तरीय प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की थी। प्रशासनिक सुविधा के लिए राज्य को विभिन्न इकाइयों—मंडल, देश, परगना/गर्ख तथा ग्राम—में विभाजित किया गया था। इन इकाइयों का संचालन सामंतों, सीकदारों/सिकदारों, सीरदारों, नेगियों, सयानों तथा अन्य स्थानीय अधिकारियों के माध्यम से होता था। राजस्व व्यवस्था में नकद एवं जिन्स दोनों रूपों में कर वसूला जाता था। ग्राम स्तर पर सयाना या बूढ़ा न्याय एवं राजस्व संबंधी कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। ताम्रपत्रों से चंदकालीन प्रान्तीय प्रशासन की संरचना और स्थानीय अधिकारियों की भूमिका की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

चंदकालीन प्रान्तीय प्रशासन प्रमुख विशेषताये

  • चंदकाल में प्रशासनिक दृष्टि से राज्य का विभाजन मंडल, देश, परगना अथवा गर्खे तथा ग्राम जैसी इकाइयों में किया गया था।
  • मंडल दो प्रकार के होते थे—सामंतों द्वारा शासित मंडलराजा द्वारा सीधे शासित मंडल।
  • चंद राजाओं ने जिस क्षेत्र को विजय किया, वहाँ के परास्त शासक को अधीनस्थ सामंत नियुक्त कर दिया जाता था। उदाहरण के लिए, भारतीचंद ने सोर के बम शासकों को परास्त करके उन्हें ही अधीनस्थ सामंत नियुक्त किया।
  • सामंतों को संभवतः ‘राजा’ एवं ‘रजबार’ की उपाधि धारण करने की स्वतंत्रता थी। वे राजा को वार्षिक कर देते थे तथा युद्ध के समय अपनी सैनिक टुकड़ी के साथ राजा की सेना में सम्मिलित होते थे। कुछ क्षेत्रों में उन्हें ‘ठक्कुर’ या ‘ठाकुर’ भी कहा जाता था।
  • मंडलों का विभाजन ‘देश’ में होता था। प्रमुख देशों में तल्ला देश, मल्ला देश, खरक देश, माल देश तथा पर्वत डोटी देश आदि शामिल थे।
  • मंडल के बाद निम्न प्रशासनिक इकाई परगना अथवा गर्ख होती थी।
  • परगने दो प्रकार के होते थे—नागरिक अधिकारी के अधीन परगने सैनिक अधिकारी के अधीन परगने।नागरिक अधिकारी को सीरदार अथवा सिकदार कहा जाता था।
  • बरम ताम्रपत्र में ‘बगसी का परगना’ का उल्लेख मिलता है।
  • चंदकालीन प्रमुख परगनों में काली कुमाऊँ, ध्यनौरौ, सोर, सीरा, फल्दाकोट, धनियाकोट, कोटली, कोटाभावर तथा कत्यूर आदि शामिल थे। मालदेश (तराई) में बगसी, छीनवी, किलपुरी, माल तथा बुक्साड आदि परगने थे।
  • उद्योतचंद के काल में जगन्नाथ बर्रे माल का सीकदार तथा गंगाराम सीरा का सीरदार था
  • मुगलों की प्रशासनिक व्यवस्था के समान चंदों ने भी परगनों में बक्शी की नियुक्ति की थी।
  • प्रत्येक परगने में खजांची, ताम्र उत्कीर्णक, ताम्रपत्र लेखक तथा धार्मिक सीकदार जैसे अधिकारी होते थे।
  • सीकदार द्वारा राजस्व का संग्रह नकद एवं जिन्स दोनों रूपों में किया जाता था।
  • एकत्रित राजस्व को सुरक्षित रखने के लिए ‘भण्डार’ तथा उसके लिए भंडारी नामक पदाधिकारी नियुक्त किया जाता था।
  • ‘कैनी’ नामक खसियों का कार्य भण्डार से अनाज को राजा तक पहुँचाना था।
  • कैनी के खर्च की व्यवस्था प्रधान द्वारा बकरा, घी, चावल, आटा आदि के रूप में की जाती थी।
  • परगनों का विभाजन गर्खों में होता था। काली कुमाऊँ एवं भावर क्षेत्र में इन्हें ‘पट्टी’ कहा जाता था।
  • बरम ताम्रपत्र में डोटी देश के अधीन ‘कसान के गर्खे’ का उल्लेख मिलता है। इससे संकेत मिलता है कि गर्ख देश से छोटी प्रशासनिक इकाई थी और इसके प्रशासक ‘नेगी’ कहलाते थे। सोर का नेगी शिरोमणि जोशी था। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि ‘नेगी’ एक पदनाम था, जाति विशेष का नाम नहीं। अपने दायित्व के बदले नेगी को ‘नेग’ मिलता था।
  • प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ‘ग्राम’ थी। ग्राम के प्रशासन का प्रमुख ‘सयाना’ अथवा ‘बूढ़ा’ कहलाता था। सयाना/बूढ़ा अपने क्षेत्र में न्यायाधीश का कार्य भी करता था। जिस स्थान पर उसकी पंचायत होती थी, उसे ‘बूढ़ाचौरा’ कहा जाता था।
  • कल्याणचंद के सैणमानुर पट्टाभिलेख में लछी गुंसाई मनराल के 16 गाँवों का सयाना होने का उल्लेख मिलता है।
  • सयाना को अनाज के रूप में दस्तूर मिलता था। वह प्रधानों के माध्यम से मालगुजारी की वसूली करता था।
  • प्रधान के अधीन कोटाल एवं प्रहरी होते थे।कोटाल — लगान का लेखा-जोखा रखता था।प्रहरी — चौकीदारी का कार्य करता था।
  • सामान्यतः उपज का छठवाँ भाग, जिसे ‘गल्ला छहड़ा’ कहा जाता था, भूराजस्व की निर्धारित दर थी।
  • प्रहरी डाकिया का कार्य भी करता था। इस प्रकार वह सुरक्षा के साथ-साथ संदेश एवं डाक पहुँचाने का कार्य भी करता था।

निष्कर्ष

चंदकालीन प्रान्तीय प्रशासन केंद्रीय सत्ता और स्थानीय प्रशासन के समन्वय पर आधारित था। राजा के अधीन मंडल और देश जैसी बड़ी प्रशासनिक इकाइयाँ थीं, जबकि परगना, गर्ख तथा ग्राम स्तर पर स्थानीय अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। सीकदार/सिकदार राजस्व संग्रह, भंडारी राजकीय भंडार, नेगी गर्ख प्रशासन तथा सयाना/बूढ़ा ग्राम प्रशासन एवं न्याय से जुड़ा था। सामंत युद्धकाल में राजा को सैनिक सहायता देते थे और नियमित रूप से कर भी प्रदान करते थे। इस प्रकार चंदों ने स्थानीय परिस्थितियों एवं पारंपरिक संस्थाओं को प्रशासन में सम्मिलित करते हुए एक व्यवस्थित बहुस्तरीय प्रान्तीय प्रशासन विकसित किया था।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *