राजा प्रदीप शाह भाग -1 |Parmar/Panwar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
राजा प्रदीप शाह पंवार/परमार वंश के उत्तराधिकार क्रम में 51वें शासक माने जाते हैं। उनके शासनकाल की शुरुआत एक ऐसे समय में हुई जब गढ़वाल और कुमाऊँ के चंद राज्यों के बीच लंबे समय से चली आ रही शत्रुता धीरे-धीरे मित्रता में परिवर्तित होने लगी। प्रदीप शाह के प्रारंभिक शासन में उनकी माता जीया कनक देई ने संरक्षिका के रूप में राजकार्य संभाला। बाद में प्रदीप शाह ने स्वयं सत्ता ग्रहण कर चंद राज्य के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने की नीति अपनाई। उनके समय रोहिलों से संघर्ष, दून क्षेत्र पर बाहरी आक्रमण, प्रशासनिक परिवर्तन, साहित्य एवं चित्रकला का संरक्षण तथा मुद्रा-प्रचलन जैसी महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं। उनके दरबार में मेधाकर शर्मा जैसे विद्वान तथा मौलाराम जैसे प्रसिद्ध चित्रकार को संरक्षण मिला। इस प्रकार प्रदीप शाह का काल राजनीतिक, सांस्कृतिक और कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा।
प्रमुख बिंदु
- वंशावलियों के अनुसार प्रदीप शाह पंवार वंश के 51वें राजा थे। वे दिलीप शाह के पुत्र थे और उनके बाद पंवार राज्य की गद्दी पर बैठे।
- प्रदीप शाह जब राजा बने, उस समय उनकी आयु मात्र पाँच वर्ष थी। इसलिए उनकी माता जीया कनक देई ने संरक्षिका के रूप में राजकार्य की देख-रेख की।
- रामपुर ताम्रपत्र में प्रदीप शाह तथा उनकी माता जीया कनक देई दोनों द्वारा किए गए भूमि-दान का उल्लेख मिलता है।
- प्रदीप शाह के अल्पवयस्क होने के कारण प्रारंभिक काल में राजदरबार में गुटबाजी बढ़ गई थी। राजपूत, खसिया तथा पंचभैया कटौचों के विभिन्न गुटों का प्रभाव राजकार्यों पर पड़ा।
- लगभग 1729–30 ई. में प्रदीप शाह ने स्वयं राज्य की सत्ता अपने हाथों में ले ली और इसके बाद शासन की दिशा पर उनका प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हुआ।
- प्रदीप शाह की माता के संरक्षण वाले शासनकाल में कुमाऊँ के चंद राज्य के साथ रणचूलाघाट और गणाई के युद्ध हुए। रणचूलाघाट के युद्ध में चंद सेना विजयी रही, जबकि गणाई के युद्ध में गढ़वाल की सेना को विजय मिली। उस समय चंद राजा देवीचंद था।
- सत्ता अपने हाथों में लेने के बाद प्रदीप शाह ने चंद राज्य के साथ शांतिपूर्ण संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। 1731 ई. में उसने भुजबल सिंह को कुमाऊँ भेजा, जो कल्याण चंद की पुत्री के विवाह में शामिल हुआ।
- 1737 ई. में प्रदीप शाह ने बंधु मित्र और लक्ष्मीधर ओझा को पत्र एवं उपहार देकर चंद राजधानी भेजा। उस समय कुमाऊँ का राजा कल्याण चंद था। कल्याण चंद ने भी इस मैत्रीपूर्ण पहल का सम्मान करते हुए पत्र और उपहार भेजे। इस प्रकार लंबे समय से चली आ रही चंद-पंवार शत्रुता मित्रता में बदलने लगी।
- 1743–44 ई. में रोहेलों ने अली मोहम्मद खाँ के नेतृत्व में कुमाऊँ पर आक्रमण किया और अल्मोड़ा पर भी अधिकार कर लिया। इस संकट में चंद राजा को राजधानी छोड़नी पड़ी। प्रदीप शाह ने उसे अपने राज्य में शरण तथा सैनिक सहायता प्रदान की, जिससे दोनों राज्यों की मित्रता और मजबूत हुई।
- हैमिल्टन के अनुसार दूनागिरी के युद्ध में गढ़वाल और कुमाऊँ की संयुक्त सेना ने रोहिलों का सामना किया। बाद में रोहिलों के हटने पर कुमाऊँ के राजा से तीन लाख रुपये की माँग की गई और प्रदीप शाह ने कल्याण चंद को आर्थिक सहायता प्रदान की।
- दूनागिरी का युद्ध इस दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है कि गढ़वाल और कुमाऊँ की सेनाओं ने पहली बार मिलकर रोहिलों के विरुद्ध युद्ध किया।
- कल्याण चंद के बाद उसका पुत्र दीपचंद 1748 ई. में कुमाऊँ का राजा बना। वह उस समय अवयस्क था और शिवदेव जोशी उसका संरक्षक नियुक्त हुआ।
- दीपचंद के समय चंद राज्य में राजनीतिक षड्यंत्र बढ़ गए। शिवदेव जोशी से असंतुष्ट हरिराम जोशी ने प्रदीप शाह को चंद राज्य पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया।
- इसके परिणामस्वरूप तामाचौड़ का युद्ध हुआ। शिवदेव जोशी ने प्रदीप शाह के उच्च अधिकारियों को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया और इस राजनीतिक चाल के कारण प्रदीप शाह पराजित हुआ।
- तामाचौड़ के युद्ध में प्रदीप शाह के सेनापति नरपति गुलेरिया मारे गए। बाद में प्रदीप शाह ने चंद राजा के साथ संधि कर ली और इसके बाद दोनों राज्यों के बीच पुनः शांति स्थापित हुई।
- दून क्षेत्र की बढ़ती समृद्धि के कारण वहाँ बाहरी लुटेरों की गतिविधियाँ भी बढ़ रही थीं। प्रदीप शाह के समय रोहिला सरदार नजीबुद्दौला ने दून क्षेत्र पर अपना ध्यान केंद्रित किया।
- 1757 ई. में नजीबुद्दौला ने दून पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया और वहाँ लूटपाट की। उपलब्ध विवरण के अनुसार उसने 1757–1770 ई. तक दून क्षेत्र पर अपना प्रभाव बनाए रखा।
- नजीबुद्दौला की मृत्यु के बाद दून क्षेत्र पर उसके पुत्र जीवता खाँ का अधिकार हुआ, लेकिन वह अधिक समय तक वहाँ शासन नहीं कर सका और प्रदीप शाह ने पुनः देहरादून पर अधिकार कर लिया।
- प्रदीप शाह ने दून की राजधानी को नवादा से धामूवाला स्थानांतरित किया।
- प्रदीप शाह के दरबारी कवि मेधाकर शर्मा/शास्त्री थे। उन्होंने ‘रामायण प्रदीप’ नामक ग्रंथ की रचना की, जो संस्कृत भाषा में लिखा गया था।
- प्रदीप शाह ने प्रसिद्ध चित्रकार मौलाराम तोमर को संरक्षण प्रदान किया। मौलाराम द्वारा बनाया गया प्रदीप शाह का रूपचित्र भी प्राप्त होने का उल्लेख मिलता है।
- मौलाराम को सबसे पहले संरक्षण देने वाला परमार शासक प्रदीप शाह माना जाता है। बाद में उन्हें ललित शाह, जयकीर्ति शाह और प्रद्युम्न शाह—इन चार परमार शासकों से संरक्षण मिला।
- प्रदीप शाह ने मोनाशाही तिमासी मुद्रा चलवाई थी। उनकी मुद्रा वर्तमान में लखनऊ संग्रहालय में सुरक्षित होने का उल्लेख मिलता है।
- प्रदीप शाह और जयपुर के राजा सवाई जयसिंह ने एक-दूसरे के राज्यों में अपने-अपने वकील/प्रतिनिधि नियुक्त किए थे। यह दोनों राज्यों के बीच विकसित हो रहे कूटनीतिक संबंधों को दर्शाता है।
- प्रदीप शाह का वकील मनु थपल्याल कुमाऊँ दरबार में नियुक्त था। इससे गढ़वाल और कुमाऊँ के बीच राजनयिक संपर्क का पता चलता है।