राजा फतेहपति शाह भाग (1664–1716 ई.) -2
- कवि मतिराम की रचनाओं में ‘वृत्त कौमुदी’ अथवा ‘छन्दसार पिंगल’ का उल्लेख मिलता है। उनका ‘रसराज’ ग्रंथ श्रीनगर के चित्रकार मंगतराम तुंवर को समर्पित बताया गया है।
- कविराज सुखदेव ने अपने ग्रंथ ‘वृत्त विचार’ में फतेह शाह की वीरता का वर्णन किया है।
- ‘फतेहशाह यशोवर्णनम्’ के रचयिता रामचन्द्र थे। यह फतेहपति शाह के शासन और यश से संबंधित महत्वपूर्ण दरबारी साहित्यिक स्रोत है।
- फतेहशाह की कीर्ति से प्रभावित होकर शिवराज भूषण तथा नीलकंठ/जटाशंकर के श्रीनगर आने का उल्लेख मिलता है।
- ‘फतेह शाह ग्रंथ’ का संपादन डॉ. शूरवीर सिंह द्वारा किया गया था। इसी प्रकार ‘इंडो-चाइना-तिब्बत ट्राएंगिल’ के लेखक श्रीरामगोपाल बताए जाते हैं।
- 1675 ई. में गुरु राम राय फतेहपति शाह के दरबार में आए। फतेहपति शाह ने उन्हें खुड़बुड़ा, राजपुर और चामासारी नामक तीन गाँव दान में दिए।
- 1676 ई. में गुरु राम राय देहरादून पहुँचे और वहाँ श्री गुरु राम राय दरबार साहिब की स्थापना की। यह उदासीन संप्रदाय से संबंधित धार्मिक एवं परोपकारी संस्था के रूप में विकसित हुआ।
- गुरु राम राय की मृत्यु 1687 ई. में हुई। उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी पंजाब कौर से संबंधित परंपरा में 1699 ई. में झंडा मेला शुरू करने का उल्लेख मिलता है।
- गुरु राम राय की मृत्यु के बाद पंजाब कौर द्वारा चेला अथवा महंत प्रथा प्रारंभ करने की परंपरा भी मिलती है। पहले महंत के रूप में औद दास का नाम दिया जाता है।
- ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार गुरु राम राय के औरंगजेब से निकट संबंध थे और औरंगजेब के कहने पर ही फतेहपति शाह द्वारा उन्हें देहरादून में भूमि दान दिए जाने का उल्लेख मिलता है। इससे फतेहपति शाह के समय गढ़वाल-मुगल संबंधों के अपेक्षाकृत मधुर होने का अनुमान लगाया जाता है।
- फतेह शाह का एक प्रसिद्ध चित्र घोड़े पर बैठे हुए मिलता है। इसमें उनकी आयु 33 वर्ष लिखी होने का उल्लेख मिलता है। यह चित्र गढ़वाली चित्रकला के इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
- फतेहपति शाह नाथपंथी संत बालकनाथ से विशेष रूप से प्रभावित थे और उनके अनुयायी माने जाते हैं। श्रीनगर के निकट गोरखनाथ गुफा से प्राप्त ताम्रपत्र में बालकनाथ जोगी/बालनाथ का उल्लेख इस संबंध में महत्वपूर्ण माना जाता है।
- फतेहपति शाह द्वारा अष्टकोणी रजत मुद्रा चलाए जाने का उल्लेख मिलता है। इसे उनके शासनकाल की मुद्रा-व्यवस्था तथा हिंदू सांस्कृतिक अभिरुचि के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जाता है।
- फतेहपति शाह ने समुद्रगुप्त की भाँति मुद्रालेख लिखवाए थे—ऐसा उल्लेख उपलब्ध सामग्री में मिलता है।
- फतेहपति शाह द्वारा सिरमौर के डाकुओं का दमन किए जाने का उल्लेख मिलता है। इस आधार पर परीक्षा में पूछा जा सकता है—“किस परमार शासक ने सिरमौर के डाकुओं का दमन किया?” उत्तर: फतेहपति शाह।
- रत्न कवि के अनुसार फतेहशाह के शासनकाल में राज्य में इतनी शांति थी कि लोग अपने घरों में ताला नहीं लगाते थे। यह उनके शासन की आदर्श शांति-व्यवस्था को दर्शाने वाला साहित्यिक वर्णन है।
- कवि मतिराम ने फतेह शाह के समय को ‘गढ़वाल का स्वर्ण काल’ कहा है। साहित्य, चित्रकला, संगीत और दरबारी संस्कृति की उन्नति के कारण यह उपमा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
- फतेहपति शाह की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी के संबंध में मौलाराम ने उपेन्द्रशाह का नाम दिया है। इस प्रकार उत्तराधिकारी संबंधी स्रोतों में मतभेदों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
निष्कर्ष
फतेहपति शाह का शासनकाल पंवार वंश के उत्कर्ष का महत्वपूर्ण काल माना जाता है। उन्होंने गढ़वाल की सैन्य शक्ति को मजबूत किया और सिरमौर, सहारनपुर, दापा तथा कुमाऊँ के विरुद्ध अनेक अभियान चलाए। कुमाऊँ के साथ उनका दीर्घकालीन संघर्ष, 1689 का भंगाणी युद्ध, 1703 का दुधौली युद्ध और 1710 में बैजनाथ तक विजय उनके सैन्य जीवन की प्रमुख घटनाएँ थीं। दूसरी ओर, मुगल सत्ता के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना और गुरु राम राय को देहरादून में भूमि उपलब्ध कराना उनकी कूटनीतिक क्षमता को दर्शाता है। उनके शासनकाल में साहित्य, संगीत, चित्रकला और धार्मिक गतिविधियों को संरक्षण मिला तथा नवरत्नों की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इसी कारण उन्हें ‘गढ़वाल का शिवाजी’, ‘गढ़वाल का अकबर’ तथा उनके काल को ‘गढ़वाल का स्वर्ण काल’ कहा गया है। कुल मिलाकर फतेहपति शाह पंवार इतिहास के सबसे प्रभावशाली शासकों में गिने जाते हैं।