राजा आसल देव |Parmar/Panwar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
पंवार/परमार राजवंश के इतिहास में राजा आसल देव का महत्वपूर्ण स्थान है। प्रारंभिक काल में पंवार सत्ता विभिन्न शाखाओं और क्षेत्रों में विभाजित रही थी, जिससे उसकी राजनीतिक शक्ति कमजोर हुई। ऐसी परिस्थितियों में आसल देव ने पंवार राजवंश की शक्ति को पुनः संगठित करने का प्रयास किया। उनके शासन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि राजनीतिक केंद्र में परिवर्तन था। उन्होंने पंवार सत्ता की राजधानी भिलंगना घाटी से स्थानांतरित कर चमोली के चाँदपुरगढ़ में स्थापित की। इस परिवर्तन ने चाँदपुरगढ़ को पंवार राजवंश के महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र के रूप में स्थापित करने में भूमिका निभाई।
प्रमुख बिंदु
- राजा आसल देव ने बिखरी हुई पंवार/परमार सत्ता को पुनः संगठित किया।
- आसल देव से पूर्व पंवार सत्ता का प्रमुख केंद्र भिलंगना घाटी में था।
- आसल देव ने अपनी राजधानी भिलंगना घाटी से हटाकर चाँदपुरगढ़ में स्थापित की।
- चाँदपुरगढ़ वर्तमान चमोली जनपद में स्थित है और आगे चलकर पंवार शासकों का महत्वपूर्ण राजनीतिक केंद्र बना।
- इस प्रकार आसल देव के शासनकाल में पंवार सत्ता के पुनर्गठन के साथ-साथ उसके राजनीतिक केंद्र का भी परिवर्तन हुआ।
निष्कर्ष
राजा आसल देव का महत्व पंवार/परमार राजवंश को पुनः संगठित करने और उसके राजनीतिक केंद्र को चाँदपुरगढ़ स्थानांतरित करने में निहित है। उन्होंने राजधानी को भिलंगना घाटी से हटाकर वर्तमान चमोली जनपद के चाँदपुरगढ़ में स्थापित किया। इस कदम से चाँदपुरगढ़ का महत्व बढ़ा और यह पंवार सत्ता के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा। इस प्रकार आसल देव का शासन पंवार राजवंश के इतिहास में राजनीतिक पुनर्गठन एवं राजधानी परिवर्तन की दृष्टि से महत्वपूर्ण चरण माना जाता है।