राजा कल्याण चंद पंचम |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
राजा कल्याण चंद पंचम चंद वंश के इतिहास में उस संक्रमणकाल के शासक थे, जब कुमाऊँ राज्य को बाहरी आक्रमणों और आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता दोनों का सामना करना पड़ रहा था। उन्हें डोटी से कुमाऊँ लाकर चंद सिंहासन पर बैठाया गया था। उनके शासनकाल में सबसे बड़ी चुनौती रोहिलों के आक्रमण के रूप में सामने आई। 1743–44 ई. में रोहिलखंड के सरदार अली मुहम्मद खाँ ने कुमाऊँ पर आक्रमण किया और अल्मोड़ा पर अधिकार कर लिया। इस घटना ने चंद राज्य की कमजोर होती स्थिति को स्पष्ट कर दिया। इसके बावजूद कल्याण चंद ने राजनीतिक संबंध बनाए रखे, प्रशासन चलाया तथा अपने अंतिम समय तक राजसत्ता को संभालने का प्रयास किया।
प्रमुख बिंदु
- लखनऊ संग्रहालय में सुरक्षित ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि कल्याण चंद पंचम को डोटी से कुमाऊँ लाकर गद्दी पर बैठाया गया था।
- राजा बनने से पहले वे डोटी में ‘कल्याण सिंह’ के नाम से मजदूरी करते थे। उन्हें अनपढ़ राजा भी बताया गया है।
- कल्याण चंद को पूरनमल और माणिकमल गैड़ा बिष्ट की पूर्व की गतिविधियों की जानकारी थी। इसलिए राजा बनने के बाद उन्होंने दोनों को मरवा दिया।
- 1743–44 ई. में रोहिलखंड (कटेहर) के सरदार अली मुहम्मद खाँ ने कुमाऊँ पर आक्रमण किया। रोहिलों के आक्रमण के कारण कल्याण चंद गढ़वाल की ओर चले गए और अल्मोड़ा पर रोहिलों का अधिकार हो गया।
- रोहिलों ने अल्मोड़ा में लूट और विनाश किया तथा राजप्रासाद, कचहरी और मंदिरों को क्षति पहुँचाई। बड़ी संख्या में लोगों को बंदी बनाए जाने की परंपरा भी मिलती है।
- हैमिल्टन के अनुसार गढ़वाल के राजा प्रदीप शाह और कुमाऊँ के राजा कल्याण चंद की संयुक्त सेना ने दूनागिरी के युद्ध में रोहिलों का सामना किया, लेकिन रोहिलों की विजय हुई।
- युद्ध के बाद रोहिलों ने कल्याण चंद से तीन लाख रुपये नजराना लिया। यह राशि प्रदीप शाह द्वारा दिए जाने का उल्लेख मिलता है।
- कल्याण चंद के संबंध में मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीला को भेंट देने के लिए जागेश्वर मंदिर से ऋण लेने का उल्लेख भी मिलता है।
- काशीपुर में मुगल वजीर कमरुद्दीन द्वारा कल्याण चंद को गार्ड ऑफ ऑनर दिए जाने का उल्लेख मिलता है।
- कल्याण चंद ने अल्मोड़ा में चौमहला महल बनवाया। वे अपनी राजधानी को ‘राजबुंगा’ कहते थे।
- उन्होंने लछी गुसाईं मनराल को सयानाचारी प्रदान की। वह 16 गाँवों का सयाना था।
- कल्याण चंद के समय अवध के नवाब मंसूर अली खाँ ने कुमाऊँ के तराई क्षेत्र पर अधिकार किया और शिवदेव जोशी को बंदी बनाया।
- ‘कल्याणचन्द्रोदयम्’ के लेखक कवि शिव थे, जो कल्याण चंद के राजकवि थे।
- उनके समय बलिराम चौधरी लेखक के पद पर कार्यरत थे।
- जीवन के अंतिम समय में कल्याण चंद की आँखों की रोशनी चली गई थी।
- 1745 ई. में नजीब खाँ के नेतृत्व में रोहिलों ने दूसरा आक्रमण किया, किंतु इस बार रोहिलों को पराजय का सामना करना पड़ा।
- कल्याण चंद के दीवान शिवदत्त जोशी थे। गढ़वाल के राजा प्रदीप शाह ने अपने दो वकील श्री बंधु मित्र और लक्ष्मीधर ओझा को उनके दरबार में भेजा था।
- जीवन के अंतिम समय में कल्याण चंद ने अपने पुत्र दीपचंद को शिवदत्त जोशी के संरक्षण में सौंपते हुए उसे अगला राजा बनाने की इच्छा व्यक्त की।
निष्कर्ष
राजा कल्याण चंद पंचम का शासन चंद राज्य के लिए संघर्ष और संकट का काल था। डोटी से कुमाऊँ लाकर सिंहासन पर बैठाए गए इस शासक को शीघ्र ही रोहिल आक्रमणों का सामना करना पड़ा। 1743–44 ई. का अली मुहम्मद खाँ का आक्रमण और अल्मोड़ा पर रोहिल अधिकार उनके शासन की सबसे गंभीर घटना थी। दूनागिरी के युद्ध में पराजय और तीन लाख रुपये नजराने की घटना ने चंद राज्य की कमजोर स्थिति को उजागर किया। दूसरी ओर उन्होंने चौमहला महल, प्रशासनिक व्यवस्था और विद्वानों के संरक्षण के माध्यम से राज्य को संभालने का प्रयास किया। ‘कल्याणचन्द्रोदयम्’ उनके साहित्यिक संरक्षण का महत्वपूर्ण प्रमाण है। जीवन के अंतिम समय में दृष्टिहीन होने के बावजूद उन्होंने उत्तराधिकार को व्यवस्थित करने का प्रयास किया और अपने पुत्र दीपचंद को शिवदत्त जोशी के संरक्षण में सौंपा। इस प्रकार उनका शासन चंद वंश के क्रमिक पतन की महत्वपूर्ण कड़ी रहा।