सविनय अवज्ञा आंदोलन एवं उत्तराखंड (1930)
परिचय
महात्मा गांधी द्वारा 1930 में प्रारंभ किया गया सविनय अवज्ञा आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण चरण था। नमक कानून तोड़ने से शुरू हुए इस आंदोलन ने उत्तराखंड के कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्रों में भी व्यापक प्रभाव डाला। स्थानीय नेताओं, विद्यार्थियों, किसानों और महिलाओं ने नमक सत्याग्रह, झंडा सत्याग्रह, विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार, शराब की दुकानों पर धरने तथा वन कानूनों के विरोध में भाग लिया। गोविंद बल्लभ पंत, बद्रीदत्त पांडे, ज्योतिराम कांडपाल, रामप्रसाद नौटियाल और विक्टर मोहन जोशी जैसे कार्यकर्ताओं ने आंदोलन को क्षेत्रीय स्तर पर आगे बढ़ाया। इस आंदोलन ने पर्वतीय क्षेत्रों में राष्ट्रीय चेतना और जनभागीदारी को नई दिशा दी।
1. सविनय अवज्ञा आंदोलन एवं दांडी यात्रा
- 12 मार्च 1930 को महात्मा गांधी ने अपने 78 सहयोगियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी यात्रा प्रारंभ की।
- लगभग 24 दिनों में करीब 240 मील की यात्रा पूरी करके गांधी जी गुजरात के दांडी गाँव पहुँचे।
- 6 अप्रैल 1930 को दांडी में नमक बनाकर गांधी जी ने ब्रिटिश नमक कानून तोड़ा।
- गांधी जी की इस यात्रा में उत्तराखंड के तीन व्यक्ति शामिल थे – ज्योतिराम कांडपाल, भैरवदत्त जोशी,गोरखावीर खड़क बहादुर।
- कुमाऊँ में नमक सत्याग्रह का नेतृत्व गोविंद बल्लभ पंत तथा गढ़वाल में प्रताप सिंह नेगी को सौंपा गया।
2. धरासना कांड (गुजरात), 1930
- धरासना कांड (गुजरात), 1930: धरासना कांड सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान घटित एक महत्वपूर्ण घटना थी। गांधीजी की गिरफ्तारी के बाद अब्बास तैयबजी ने धरासना नमक कारखाने पर सत्याग्रह का नेतृत्व संभाला, लेकिन उनकी गिरफ्तारी के बाद सरोजिनी नायडू ने आंदोलन का नेतृत्व किया। 21 मई 1930 को सत्याग्रहियों ने धरासना नमक कारखाने की ओर मार्च किया, जहाँ ब्रिटिश पुलिस ने निहत्थे सत्याग्रहियों पर बर्बर लाठीचार्ज किया। अमेरिकी पत्रकार वेब मिलर की रिपोर्टिंग से इस घटना को अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि मिली और ब्रिटिश शासन के दमनकारी चरित्र को दुनिया के सामने उजागर किया।
- ज्योतिराम कांडपाल(अध्यापक ज्योति राम कांडपाल ने आंदोलन के लिए पद से इस्तीफा भी दे दिया था।) धरासना कांड (गुजरात) में शामिल होने वाले उत्तराखंड के एकमात्र व्यक्ति थे।
- ज्योतिराम कांडपाल ने देघाट में उद्योग मंदिर आश्रम की स्थापना 1931 मे की।जिन्हें गांधी जी ₹100 महावार के लिए देते थे
- सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान ज्योतिराम कांडपाल एक साल की सख्त जेल और 200 रुपया जुर्माना तथा कुर्की भी हुई।
3. कुमाऊँ में सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रभाव
- कुमाऊं में नमक सत्याग्रह का संपूर्ण दायित्व गोविंद बल्लभ पंत के ऊपर था।
- 21 मई 1930 को गोविंद बल्लभ पंत, हर्ष देव ओली, इंद्र सिंह नयाल के नेतृत्व में नैनीताल मालरोड में नमक आंदोलन को लेकर जुलूस निकाला गया।
- 23 मई को गोविंद बल्लभ पंत ने मल्लीताल रामलीला मैदान में 25 मई को नमक बनाए जाने की घोषणा की लेकिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद इंद्र सिंह नयाल ने सभा आयोजित कर नमक बेचा और वह भी गिरफ्तार हो गए। बाद में बद्रीदत्त पांडे और कृष्णानंद जोशी नैनीताल आए और आंदोलन की कमान संभाली
- नैनीताल में 27 मई 1930 को बद्रीदत्त पांडे द्वारा व्याख्यान दिया गया एवं नमक बेचा गया।
- उग्रवादी विचारधारा के पंडित भगीरथ पांडे ने सल्ट में एक स्थान पर रामगंगा नदी के किनारे नमक बनाकर नमक कानून भंग किया।
4. अल्मोड़ा नगर पालिका में झंडा सत्याग्रह
- 1930 में शुरू हुई है सविनय अवज्ञा आंदोलन का पूरे देश में अलग-अलग स्वरूप था। अल्मोड़ा में भी नमक सत्याग्रह हुआ लेकिन इसने झंडा सत्याग्रह का रूप धारण कर लिया.
- 4 मई 1930 को राष्ट्रीय ध्वज हाथ में लेकर जुलूस निकाला निकाला गया और अल्मोड़ा के नंदा देवी मंदिर के प्रांगण में एक सभा हुई जिसकी अध्यक्षता विक्टर मोहन जोशी द्वारा की गई।शांतिलाल त्रिवेदी ने विदेशी वस्त्र बहिष्कार का प्रतिज्ञा पत्र पड़ा। इसके बाद 25 मई को सर्वसम्मति से अल्मोड़ा नगर भवन पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का निर्णय लिया गया।
- 26 मई 1930 अल्मोड़ा में जुलूस एवं नंदा देवी के प्रांगण में सभा हुई जिसकी अध्यक्षता शांतिलाल त्रिवेदी द्वारा की गई। इस सभा में नगर पालिका के भवन पर झंडा फहराने का प्रस्ताव पुनः पारित किया गया।
- अल्मोड़ा नगर पालिका के अध्यक्ष साहब ने स्वयं 27 जून को नगर पालिका भवन में राष्ट्रीय ध्वज फहराया। यह कुमाऊं में सत्याग्रह की अभूतपूर्व विजय थी।
- अल्मोड़ा में झंडा सत्याग्रह के दौरान विक्टर मोहन जोशी पर लाठियां का ऐसा जबर्दस्त प्रहार किया गया कि उनकी रीड की हड्डी पर काफी चोटे आ गई,इसके बाद ये इन चोटों से उबर न सके, जिसके कारण उत्तराखंड का यह महान देशभक्त अक्टूबर 1940 को मात्र 44 वर्ष की आयु में दुनिया को छोड़कर चल गया।
- गांधी जी ने विक्टर मोहन जोशी की प्रशंसा में कहा था कि वह भारतीय ईसाई समुदाय के उत्कृष्टतम पुरुषों में से एक हैं.
- मौलाना मोहम्मद अली द्वारा अल्मोड़ा को भारतीय आंदोलन का शस्त्रागार कहा गया।
- पिथौरागढ़ से सविनय अवज्ञा आंदोलन का नेतृत्व प्रयाग दत्त पंत ने किया।
5. ब्रिटिश गढ़वाल में सविनय अवज्ञा आंदोलन
- सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय गढ़वाल में आंदोलन का गढ़ दुगड्डा बन गया था।
- कांग्रेस के 1929 लाहौर अधिवेशन में गढ़वाल से प्रताप सिंह नेगी, कृपाराम मिश्र, राम प्रसाद नौटियाल, जगमोहन नेगी आदि नेताओं ने भाग लिया.
- 30 मई 1930 को दुगड्डा में गढ़वाल का प्रथम राजनीतिक सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसके उद्घाटन के लिए पंडित गोविंद बल्लभ पंत को आमंत्रित किया गया था लेकिन नमक सत्याग्रह के कारण जेल में बंद होने के कारण उनके स्थान पर हरगोविंद बल्लभ पंत को आमंत्रित किया गया।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन को अंतिम रूप देने के उद्देश्य से जून 1930 में कोट सितोनस्यूँ (पौड़ी गढ़वाल) में कांग्रेस का सम्मेलन बुलाया गया जो पंडित हरगोविंद बल्लभ पंत की अध्यक्षता में संपन्न हुआ।
- चमोली जनपद में सविनय अवज्ञा सत्याग्रह संचालित करने की जिम्मेदारी रामप्रसाद नौटियाल के दल को सौंपी गई। उनके दल का एक सदस्य सत्याग्रह का प्रचार करते हुए बद्रीनाथ पहुँचा और बद्रीनाथ मंदिर में तिरंगा फहराया।
- पौड़ी जेल में 1930 ई. में डिप्टी कमिश्नर इबटसन ने अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के साथ दुर्व्यवहार किया। इसके कारण गढ़वाल में कमिश्नर का विरोध होने लगा। तब कमिश्नर ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के विरुद्ध दमनात्मक कार्रवाई शुरू की, जिसे इबटसन कांड के नाम से जाना जाता है।18 जुलाई 1930 को इबटसन कांड होता है।
- इबटसन कांड में बंदी बनाए गए व्यक्तियों की ओर से मुकदमो में की पैरवी बैरिस्टर मुकंदी लाल द्वारा की गई.
- इबटसन कांड में बंदी बनाए गए प्रमुख व्यक्ति भोलादत्त चंदोला,महेशानंद थपलियाल, कोतवाल सिंह नेगी (पौड़ी का कोतवाल कहा जाता है) आदि थे।
- पौड़ी के यमकेश्वर क्षेत्र में कांग्रेस सत्याग्रह में जगमोहन सिंह नेगी का प्रमुख योगदान रहा।
- 28 अगस्त 1930 को जयानन्द भारती व उनके साथियों ने जहारीखाल स्कूल में झंडा फहराया था।
- ब्रिटिश गढ़वाल में दुगड्डा राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र स्थल बन गया था इसलिए अंग्रेज प्रशासक इसे राजनीति का क्रीडा स्थल कहकर संबोधित करते थे
6. गढ़वाल में लगान बंदी कार्यक्रम
- सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान गढ़वाल में किसानों को भूमि पर लगान न देने के लिए प्रेरित करने वाला लगानबंदी कार्यक्रम चलाया गया।
- इस कार्यक्रम को गुजड़ू क्षेत्र के किसानों के सहयोग से रामप्रसाद नौटियाल ने आगे बढ़ाया।
7. गढ़वाल में शराबबंदी आंदोलन
- 7 मई 1930 को जगमोहन सिंह नेगी, छवाण सिंह, नारायण दास महंत आदि आंदोलनकारियों ने लैंसडौन में शराब की भट्टियों के विरुद्ध कार्रवाई की।
- उदयपुर क्षेत्र में डबल सिंह नेगी ने शराब की भट्टियों के विरुद्ध धरना दिया।
- प्रताप सिंह नेगी के नेतृत्व में कोटद्वार और दुगड्डा में शराब की भट्टियों तथा दुकानों की नाकेबंदी के लिए अभियान चलाया गया।
8. सविनय अवज्ञा आंदोलन में महिलाओं की भूमिका
- 1931 ई. में बागेश्वर में एक महिला सम्मेलन हुआ, जिसमें विदेशी कपड़ों के बहिष्कार एवं खादी के प्रचार का निर्णय लिया गया। कुंती वर्मा के नेतृत्व में महिलाओं का दल हल्द्वानी पहुँचा, जहाँ महिला सत्याग्रहियों की पहली गिरफ्तारी हुई।
- ‘अमृत बाजार’ पत्रिका में अल्मोड़ा की बिशनी देवी शाह को कुमाऊँ स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाने वाली महिला बताया गया।
- नमक सत्याग्रह के समय अल्मोड़ा के नगरपालिका भवन में बिशनी देवी शाह के नेतृत्व में कुंती वर्मा, जीवन्ती देवी , मंगला देवी आदि महिलाओं ने झंडा फहराया था।
- 1932 में राज्य की 8 महिलाओं को फतेहगढ़ जेल और पदमा जोशी को लखनऊ जेल तथा कुंती वर्मा को जिंदा या मुर्दा पकड़ने का आदेश जारी हुआ था।
9. श्रीदेव सुमन की भूमिका
- श्रीदेव सुमन ने कम उम्र में ही स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों में भाग लेना शुरू कर दिया था।
- वर्ष 1930 में, लगभग 14 वर्ष की आयु में, उन्होंने देहरादून में नमक आंदोलन में भाग लिया।
- इस गतिविधि के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया और 15 दिन के कारावास की सजा भुगतनी पड़ी।
निष्कर्ष
सविनय अवज्ञा आंदोलन ने उत्तराखंड के कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्रों में स्वतंत्रता संग्राम को व्यापक जनाधार प्रदान किया। नमक सत्याग्रह, झंडा सत्याग्रह, लगानबंदी, शराबबंदी तथा वन कानूनों के विरोध ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनभागीदारी को मजबूत किया। महिलाओं, किसानों और स्थानीय कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका ने इस आंदोलन को क्षेत्रीय स्तर पर व्यापक बनाया। इस प्रकार उत्तराखंड ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।