कत्यूरी कालीन मूर्तिकला |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

कत्यूरी काल उत्तराखंड के कला एवं संस्कृति के विकास का महत्वपूर्ण काल माना जाता है। इस काल में मंदिर निर्माण के साथ-साथ मूर्तिकला का भी उल्लेखनीय विकास हुआ। कत्यूरी शासकों के संरक्षण में निर्मित एवं विकसित अनेक मंदिरों से शिव, विष्णु, देवी तथा अन्य देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। इन प्रतिमाओं में धार्मिक आस्था के साथ-साथ तत्कालीन शिल्पकारों की कलात्मक दक्षता, सूक्ष्म नक्काशी तथा सौंदर्य-बोध का परिचय मिलता है। पाषाण और धातु दोनों का प्रयोग हुआ, किंतु पाषाण मूर्तियों की संख्या अधिक है। लाखामण्डल, बैजनाथ, जागेश्वर, बागेश्वर, आदि बद्री आदि इसके प्रमुख केंद्र रहे।

प्रमुख बिंदु

  • कत्यूरी कालीन मंदिरों से अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, जो इस काल की विकसित मूर्तिकला का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।
  • इस काल में मूर्तियों के निर्माण के लिए मुख्यतः पाषाण एवं धातु का प्रयोग किया गया, जिनमें पाषाण मूर्तियों की संख्या अधिक है।
  • पाषाण मूर्तियों के निर्माण में काले, सफेद तथा हरे बलुए पाषाण का प्रयोग किया गया था।
  • बैजनाथ मंदिर समूह में हरे बालुवीय पाषाण से निर्मित अनेक मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, जो कत्यूरी कालीन शिल्प-कौशल की विशेषता को दर्शाती हैं।
  • इस काल में मुख्यतः शिवलिंग, हर-गौरी, नंदी, कार्तिकेय, गणेश, नृसिंह, विष्णु तथा दुर्गा आदि देवी-देवताओं की मूर्तियों का निर्माण हुआ।
  • कत्यूरी मूर्तिकला में शैव एवं वैष्णव धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ देवी उपासना से संबंधित प्रतिमाओं का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा।
  • कत्यूरी कालीन मूर्तिकला के प्रमुख केंद्रों में लाखामण्डल, गंगाद्वार, श्रीनगर, आदि बद्री, जोशीमठ, जागेश्वर, बागेश्वर एवं कटारमल आदि का उल्लेख किया जाता है।
  • कालीमठ की हर-गौरी प्रतिमा को कत्यूरी कालीन मूर्तिकला की उत्कृष्ट उपलब्धियों में माना जाता है। राहुल सांकृत्यायन ने इसकी प्रशंसा करते हुए कहा— “आज सारे भारत में इतनी सुन्दर अखण्ड हर मूर्ति कहीं भी नहीं है।”
  • इन मूर्तियों में धार्मिक विषयों के साथ आकृति-सौंदर्य, भाव-प्रदर्शन, अलंकरण और शिल्प-कौशल का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
  • कत्यूरी कालीन मूर्तिकला ने उत्तराखंड की मंदिर परंपरा को समृद्ध करने के साथ-साथ क्षेत्र में विकसित विशिष्ट हिमालयी कला-परंपरा को भी सुदृढ़ आधार प्रदान किया।

निष्कर्ष

कत्यूरी कालीन मूर्तिकला उत्तराखंड की प्राचीन कला-परंपरा की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस काल में मंदिर स्थापत्य के साथ मूर्ति निर्माण की कला भी पर्याप्त विकसित हुई। पाषाण एवं धातु से निर्मित देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ तत्कालीन धार्मिक विश्वासों के साथ शिल्पकारों की उत्कृष्ट कलात्मक प्रतिभा को भी व्यक्त करती हैं। बैजनाथ, जागेश्वर, लाखामण्डल, बागेश्वर, आदि बद्री और कटारमल जैसे केंद्र इस समृद्ध परंपरा के प्रमुख प्रमाण हैं। शिव, विष्णु, हर-गौरी, गणेश, कार्तिकेय, नृसिंह और दुर्गा आदि की प्रतिमाओं में विविध धार्मिक धाराओं का प्रभाव दिखाई देता है। विशेष रूप से हर-गौरी जैसी उत्कृष्ट प्रतिमाएँ कत्यूरी शिल्पकला की परिपक्वता को दर्शाती हैं। इसलिए कत्यूरी कालीन मूर्तिकला को उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ भारतीय कला इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी माना जा सकता है।

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