कत्यूरी वंश का उदगम एवं उत्पति |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
उत्तराखण्ड के इतिहास में कत्यूरी वंश का महत्वपूर्ण स्थान है। इस वंश ने लंबे समय तक उत्तराखण्ड के विस्तृत भू-भाग पर शासन किया और क्षेत्र की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक परंपराओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कत्यूरी वंश के इतिहास की चर्चा करते समय इसके उद्गम एवं उत्पत्ति का प्रश्न विशेष महत्व रखता है। कत्यूरी वंश की उत्पत्ति के संबंध में इतिहासकारों और विद्वानों में पूर्ण सहमति नहीं है। विभिन्न विद्वानों ने उपलब्ध ऐतिहासिक, साहित्यिक, पुरातात्विक एवं अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर इसके उद्गम की अलग-अलग व्याख्या की है। इसलिए कत्यूरी वंश की उत्पत्ति को उत्तराखण्ड के इतिहास का एक महत्वपूर्ण एवं मतभेदपूर्ण विषय माना जाता है।
प्रमुख बिंदु
- कत्यूरी वंश की उत्पत्ति के संबंध में इतिहासकारों में मतभेद पाया जाता है। इसकी उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं।
- एक जनश्रुति के अनुसार शालिवाहन नामक सूर्यवंशी राजकुमार अयोध्या से आकर अल्मोड़ा क्षेत्र के कत्यूर नामक स्थान में रहने लगा। उसके वंशज कत्यूर में निवास करने के कारण कत्यूरी कहलाए। हालांकि, इस मत के समर्थन में प्रमाणिक ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
- एटकिंसन ने कत्यूरी वंश को काबुल तथा पश्चिमी हिमालय की ढलानों में निवास करने वाली कटोर नामक आयुधजीवी जाति से संबंधित माना है, लेकिन कटोर और कत्यूरी को एक ही सिद्ध करने के लिए पर्याप्त ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
- राहुल सांस्कृत्यायन ने कत्यूरी वंश का संबंध शक-कुषाणों से माना। उनके अनुसार हूणों से पराजित होने के बाद शक-कुषाणों ने उत्तराखण्ड में कत्यूरी सत्ता की स्थापना की होगी।
- राहुल सांस्कृत्यायन ने शक शासक शालिवाहन तथा कत्यूरी वंश के संस्थापक शालिवाहन को एक ही व्यक्ति माना है।
- अपने मत के समर्थन में उन्होंने कटारमल, बागेश्वर तथा द्वाराहाट आदि के मंदिरों में प्राप्त बूटधारी सूर्य की मूर्तियों का उल्लेख किया और इन्हें शक परंपरा से संबंधित माना।
- उत्तराखण्ड के इतिहासकार शिवप्रसाद डबराल ने कत्यूरी वंश को खशों से संबंधित माना है। उन्होंने अपने मत के समर्थन में बंगाल के पाल शासकों के अभिलेखों का सहारा लिया।
- डबराल के अनुसार खश उत्तराखण्ड की एक शक्तिशाली जाति थी, जिसने कोल एवं किरातों को पराजित कर इस क्षेत्र में अपनी सत्ता स्थापित की थी। उन्होंने कत्यूरी और खशों की सामाजिक स्थिति में भी समानता का उल्लेख किया है।
- कार्तिकेयपुर के राजाओं के लिए ‘कत्यूरी’ नाम का प्रयोग सर्वप्रथम एटकिंसन ने अपनी पुस्तक Himalayan Districts, खंड-2 (1884) में किया। बाद में अन्य इतिहासकारों ने भी इस नाम का प्रयोग किया
- पावेल-प्राइस ने कत्यूरी शासकों को कुणिन्दों से जोड़ने का प्रयास किया। उनके अनुसार गुप्तकाल में कर्तृपुर/कार्तिकेयपुर कुणिन्दों का प्रमुख गढ़ था और बाद के शासक कत्यूरी कहलाए।
- इस प्रकार कत्यूरी वंश की उत्पत्ति के संबंध में शालिवाहन, कटोर, शक-कुषाण, खश तथा कुणिन्द से संबंधित विभिन्न मत मिलते हैं।
- उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर किसी एक मत को पूर्णतः निर्विवाद रूप से स्वीकार करना कठिन है। इसलिए कत्यूरी वंश की उत्पत्ति को विवादित विषय मानना अधिक उचित है।
निष्कर्ष
कत्यूरी वंश की उत्पत्ति उत्तराखण्ड के इतिहास के सबसे विवादित प्रश्नों में से एक है। शालिवाहन की जनश्रुति, एटकिंसन का कटोर सिद्धांत, राहुल सांस्कृत्यायन का शक-कुषाण सिद्धांत, शिवप्रसाद डबराल का खश सिद्धांत तथा पावेल-प्राइस का कुणिन्द सिद्धांत इस विषय की विविधता को दर्शाते हैं। इनमें शिवप्रसाद डबराल का खश संबंधी मत उपलब्ध परिस्थितियों में अधिक तर्कसंगत प्रतीत किया गया है, किंतु इसे भी अंतिम एवं निर्विवाद निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। अतः कत्यूरी वंश की उत्पत्ति के प्रश्न पर अभिलेखीय, पुरातात्विक एवं साहित्यिक प्रमाणों के समन्वित अध्ययन की आवश्यकता है।