उत्तराखंड में कुषाण शासन |Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
कुषाण मूलतः मध्य एशिया की यूएझी (Yueh-chi) जाति की एक शाखा थे, जिन्होंने भारत में आकर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। ईस्वी की प्रारम्भिक शताब्दियों में कुषाण सत्ता का विस्तार मध्य एशिया से उत्तर भारत तक हुआ। कुजुल कडफिसेस, विम कडफिसेस, कनिष्क, हुविष्क और वासुदेव इनके प्रमुख शासक थे। इनमें कनिष्क प्रथम सर्वाधिक प्रसिद्ध था, जिसके समय कुषाण साम्राज्य अपने उत्कर्ष पर पहुँचा। शकों के बाद उत्तराखंड के तराई एवं मैदानी क्षेत्रों पर कुषाणों का अधिकार स्थापित हुआ, जबकि मध्य हिमालय में कुणिन्दों की स्वतंत्र सत्ता बनी रही। उत्तराखंड में प्राप्त कुषाणकालीन स्वर्ण एवं ताम्र मुद्राएँ तथा पुरातात्त्विक अवशेष इस क्षेत्र में कुषाण प्रभाव के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं।
उत्तराखंड में कुषाण शासन प्रमुख तथ्य
- शकों के बाद उत्तराखंड राज्य के तराई वाले भागों पर कुषाणों ने अधिकार कर लिया
- ईसवी की आरम्भिक तीन शताब्दियों में कुषाणों ने मध्य एशिया से लेकर समस्त उत्तर भारत पर शासन किया। कुषाणों को प्राचीन भारतीय वाङ्मय में प्रायः ‘ऋषिक’, ‘तुषार’ अथवा ‘तुखार’ तथा ‘तुरुष्क’ कहा गया है। चीनी इतिहासकारों के अनुसार, वे यूह-ची (Yueh-chi) अथवा Great Yueh-ti जाति की एक शाखा के थे।
- कुषाण-आधिपत्य काल में भी मध्य हिमालय में कुणिन्दों की स्वतंत्र सत्ता थी। अवश्य, कुषाणों की महती शक्ति के समक्ष हिमालय के स्वाभिमानी कुणिन्दों को अपने पर्वतीय भूभाग पर ही संतुष्ट रहना पड़ा।
- विम-कदफिसस परिवार की कोई मुद्रा इस प्रदेश में प्राप्त नहीं हुई है। अतएव महान कुषाण सम्राट कनिष्क प्रथम के परिवार को मध्य हिमालय के तराई प्रदेश पर अधिकार करने का श्रेय है। परसिया से पाटलिपुत्र तक विस्तृत उसके साम्राज्य की राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) थी। उसने 78 ई० में शक संवत् का आरम्भ किया। कनिष्क के उत्तराधिकारियों ने उसके द्वारा विजित प्रदेशों को पूर्ववत् अपने अधिकार में रखा।
- कुषाणों की मुद्राएँ उत्तराखण्ड हिमालय की तराई में, कभी-कभी सिवालिक के समीप भी, प्राप्त हो चुकी हैं
- कुषाणकालीन मुद्राएँ वीरभद्र, मोरध्वज, गोविषाण से प्राप्त हुई
- गोविषाण सिक्कों की खोज 1960 ई. में के. पी. नौटियाल ने की
- प्राचीन एवं वर्तमान नाम वीरभद्र — ऋषिकेश, मोरध्वज — कोटद्वार, गोविषाण — काशीपुर
- कनिष्क की नाणक स्वर्ण मुद्राएँ काशीपुर से प्राप्त हुई थीं।
- कनिष्क ने 78 ई. में शक संवत् चलाया और जिसका उत्तराधिकारी हुविष्क था।
- हुविष्क की 44 स्वर्ण मुद्राएँ मुनि की रेती,टिहरी गढ़वाल से 1972 ई. में प्राप्त हुईं,पुरोभाग पर राजा की आवक्ष आकृति तथा पृष्ठभाग पर ग्रीक एवं ईरानी देवी-देवताओं (नाना, अरदोक्षो, मीरो) का अंकन है।
- वासुदेव प्रथम — 5 स्वर्ण मुद्राएँ बिजनौर जिले में गंगा खादिर के किनारे टिप ग्राम के टीले के उत्खनन से 1886 ई० में मरखाम को प्राप्त हुईं। अब राज्य संग्रहालय, लखनऊ में हैं।
- कुषाण शासक वासुदेव द्वितीय की 3 स्वर्ण मुद्राएँ गोविषाण टीले से प्राप्त हुईं, जिन मुद्राओं में शिव व नंदी का चित्र बना था
- सात कुषाण स्वर्ण-मुद्राएँ खटीमा के समीप कञ्चनपुरी से प्राप्त हुईं, जिन पर राजा वसु तथा मश्र के नाम पढ़े गये, जो उत्तरकालीन कुषाण राजा बताये गये हैं; किन्तु इनका शुद्ध अभिवाचन अभी नहीं हुआ है। ये अब अल्मोड़ा संग्रहालय में हैं।
- एक कुषाण ताम्र-मुद्रा वीरभद्र के उत्खनन से प्राप्त हुई।
- उक्त मुद्राओं के अतिरिक्त, मोरध्वज, पाण्डुवाला, भरत मन्दिर तथा वीरभद्र के उत्खननों से विभिन्न प्रकार के कुषाण-अवशेष उपलब्ध हुए हैं।
- भारत में सर्वाधिक शुद्ध सोने के सिक्के कुषाणों ने जारी किए
- कनिष्क रेशम मार्ग (Silk Route) पर नियंत्रण रखने वाले सबसे प्रसिद्ध कुषाण शासकों में से एक था|
कुषाण का अंत
- कुषाण मुद्राओं के उक्त प्राप्ति-स्थानों से ज्ञात होता है कि कनिष्क तथा हुविष्क के काल में कुणिन्दों के मैदानी भाग कुषाणों के अधिकार में चले गये थे।
- अम्बाला, करनाल आदि स्थानों से कुषाण-मुद्राओं तथा सुघ से कुषाण टेराकोटा की प्राप्ति से पड़ोसी मैदानी भाग पर कुषाण आधिपत्य की पुष्टि होती है।
- परन्तु मध्य हिमालय के पर्वतीय प्रदेश कुषाण-सत्ता के अन्तर्गत कभी नहीं आये। पर्वतीय प्रदेश में तब भी कुणिन्दों का स्वतंत्र राज्य स्थापित था।
- कुषाण-सत्ता अधिक काल तक स्थिर न रह सकी। अल्तेकर के अनुसार, वे यौधेय, कुणिन्द आदि आयुधजीवी संघ ही थे जिन्होंने मैदानी भागों से भी उन्हें शीघ्र उखाड़ फेंका।
- वस्तुतः, जैसा हरिदत्त वेदालंकार का कथन है, कुषाण साम्राज्य के पतन और क्षीणता का कारण केन्द्रीय शक्ति की निर्बलता, साम्राज्य के पूर्वी प्रदेशों में यौधेयों तथा पश्चिमी प्रदेशों में सासानी शक्ति का आविर्भाव था।
- सासानी शक्ति ईरान में स्थापित एक शक्तिशाली साम्राज्य था, जिसकी स्थापना अर्दशीर प्रथम ने लगभग 224 ई. में की। तीसरी शताब्दी ईस्वी में इसके उदय से कुषाण साम्राज्य की पश्चिमी सीमाओं पर राजनीतिक एवं सैन्य दबाव बढ़ गया, जिससे कुषाणों की शक्ति कमजोर हुई। इस प्रकार पश्चिम में सासानी शक्ति का विस्तार कुषाण साम्राज्य के पतन के प्रमुख कारणों में से एक माना जाता है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड के इतिहास में कुषाण काल तराई एवं मैदानी क्षेत्रों में बाहरी राजनीतिक सत्ता के विस्तार का महत्वपूर्ण चरण था। शकों के बाद कुषाणों ने तराई क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया, लेकिन मध्य हिमालय में कुणिन्दों की स्वतंत्र सत्ता बनी रही। वीरभद्र, मोरध्वज, गोविषाण, काशीपुर और मुनि की रेती से प्राप्त मुद्राएँ कुषाणों के राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव को प्रमाणित करती हैं। बाद में केंद्रीय कुषाण शक्ति के कमजोर होने तथा यौधेय-कुणिन्द जैसी शक्तियों के उभार से उनका प्रभाव समाप्त हुआ और उत्तराखंड का क्षेत्र पुनः स्थानीय शक्तियों के नियंत्रण में आ गया।