प्रारंभिक मुद्राये (225BC-175BC)|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
कुणिन्दों की प्रारम्भिक मुद्राएँ उनके इतिहास को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्रोत हैं। इन मुद्राओं पर उत्कीर्ण लेख एवं प्रतीक तत्कालीन कुणिन्द जनपद के राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन की जानकारी प्रदान करते हैं। इनसे कुणिन्दों के प्रारम्भिक संगठन, मुद्रा-प्रचलन तथा धार्मिक मान्यताओं के संबंध में महत्वपूर्ण संकेत प्राप्त होते हैं।
मुख्य तथ्य व विशेषताये
- कुणिन्द जनपद की प्रारम्भिक मुद्राओं में किसी शासक का नाम उत्कीर्ण न होकर मात्र ‘कुणिन्द’ उत्कीर्ण है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रारम्भ में कुणिन्द जनपद एक गणराज्य रहा होगा।
- इन मुद्राओं की लिपि ब्राह्मी है।
- ये ताम्र धातु से निर्मित हैं।
- कुणिन्द कालीन प्राप्त मुद्राओं में ‘कादस्य’ शब्द उत्कीर्ण मुद्रायें भी मिले हैं। कनिंघम एवं एलन ने काद को शासक का नाम मानने के बजाय ‘जन’ माना है और इसका समय 225 ई० पूर्व से 175 ई० पूर्व तक माना है।
- इन मुद्राओं के अग्रभाग में बोधिवृक्ष, त्रिशूल, इत्यादि तथा पृष्ठभाग में फैली हुई सूर्य किरणें उत्कीर्ण हैं।
- प्रारम्भिक कुणिन्द मुद्राएँ आकार एवं निर्माण की दृष्टि से अपेक्षाकृत साधारण थीं, जिनमें अलंकरण की अपेक्षा प्रतीकात्मक अंकन को अधिक महत्व दिया गया।
- इन मुद्राओं पर अंकित धार्मिक एवं प्रतीकात्मक चिन्ह तत्कालीन कुणिन्द समाज की धार्मिक मान्यताओं एवं सांस्कृतिक परंपराओं की ओर संकेत करते हैं।
- इन मुद्राओं का प्राप्त होना कुणिन्द जनपद में मुद्रा-प्रचलन एवं आर्थिक गतिविधियों के विकास का प्रमाण प्रस्तुत करता है।
निष्कर्ष
अतः प्रारम्भिक कुणिन्द मुद्राएँ कुणिन्द इतिहास के पुनर्निर्माण में विशेष महत्व रखती हैं। इन पर अंकित ‘कुणिन्द’ एवं ‘कादस्य’ जैसे लेख तत्कालीन राजनीतिक संगठन एवं जनपदीय पहचान के महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। शासक के नाम का अभाव इनके प्रारम्भिक गणात्मक स्वरूप की सम्भावना को बल देता है। वहीं बोधिवृक्ष, त्रिशूल तथा अन्य प्रतीकों का अंकन तत्कालीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं की ओर संकेत करता है। ताम्र धातु तथा ब्राह्मी लिपि का प्रयोग उस समय की मुद्रा-परंपरा और लेखन-पद्धति को समझने में भी सहायक है। इसलिए प्रारम्भिक कुणिन्द मुद्राएँ केवल आर्थिक लेन-देन का साधन नहीं, बल्कि कुणिन्दों की राजनीतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्थिति को जानने का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रमाण हैं।