कुणिन्द जनपद का विस्तार|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

कुणिन्द जनपद प्राचीन उत्तर भारत के मध्य हिमालय क्षेत्र में विकसित एक महत्वपूर्ण जनपदीय एवं राजनीतिक शक्ति था। इसकी भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि यह हिमालय की आन्तरिक घाटियों को गंगा-यमुना के मैदानी क्षेत्रों से जोड़ता था। कुणिन्द जनपद के विस्तार का निर्धारण मुख्यतः महाभारत एवं टॉलमी के विवरणों तथा कुणिन्द मुद्राओं के वितरण के आधार पर किया जाता है। इन साक्ष्यों से इसके व्यापक राजनीतिक प्रभाव-क्षेत्र और सीमाओं का अनुमान लगाया जा सकता है।

कुणिन्द जनपद का विस्तार

  • महाभारत के अनुसार कुणिन्द जनपद का विस्तार गंगाद्वार (हरिद्वार एवं इसका समीपस्थ क्षेत्र) से लेकर सुदूर हिमालय की पर्वत-शिखरियों तक था। इससे स्पष्ट होता है कि कुणिन्दों का प्रभाव हिमालयी क्षेत्र के साथ-साथ गंगा के मैदानी क्षेत्र तक भी फैला हुआ था। वहीं टॉलमी के विवरण से ज्ञात होता है कि कुणिन्द जनपद का विस्तार सतलज, यमुना एवं गंगा की उद्गम घाटियों के आसपास के हिमालयी क्षेत्र में था।
  • कुणिन्द जनपद के वास्तविक विस्तार को समझने में पुरातात्विक साक्ष्य, विशेषकर कुणिन्द शासकों की मुद्राएँ, अधिक स्पष्ट प्रमाण प्रदान करती हैं। कुणिन्द शासकों की अनेक मुद्राएँ विभिन्न स्थानों से प्राप्त हुई हैं। इन मुद्राओं का वितरण पश्चिम में सतलज नदी से लेकर पूर्व में काली नदी तक पाया गया है। इनके वितरण से कुणिन्दों के राजनीतिक प्रभाव-क्षेत्र की व्यापकता का अनुमान लगाया जा सकता है।
  • उपलब्ध साहित्यिक एवं पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर अनुमान किया जा सकता है कि कुणिन्द जनपद अपने चरमोत्कर्ष काल में एक विस्तृत हिमालयी-मैदानी क्षेत्र में फैला हुआ था। इसका विस्तार पूर्व में काली नदी से पश्चिम में सतलज नदी तक तथा उत्तर में हिमालय की आन्तरिक घाटियों से दक्षिण में सहारनपुर तक माना जाता है। इस प्रकार कुणिन्दों का प्रभाव वर्तमान उत्तराखण्ड के अधिकांश भाग के साथ उससे लगे हिमालयी एवं मैदानी क्षेत्रों तक फैला हुआ था।
  • कुणिन्द राज्य की सीमाएँ – कुणिन्द जनपद की अनुमानित सीमाओं को चारों दिशाओं के आधार पर निम्न प्रकार समझा जा सकता है—
    • उत्तर – हिमालय पर्वत: उत्तर दिशा में कुणिन्द क्षेत्र की सीमा हिमालय की ऊँची पर्वत-शृंखलाओं एवं आन्तरिक घाटियों तक मानी जाती है।
    • दक्षिण – बेहट (सहारनपुर): दक्षिण में इसका विस्तार शिवालिक क्षेत्र को पार करते हुए बेहट (सहारनपुर) के मैदानी क्षेत्र तक माना जाता है
    • पश्चिम – सतलज नदी: पश्चिमी सीमा सतलज नदी तक मानी जाती है, जिससे कुणिन्दों का पश्चिमी हिमालय से संबंध स्पष्ट होता है।
    • पूर्व – काली नदी: पूर्वी सीमा काली नदी तक मानी जाती है, जो वर्तमान उत्तराखण्ड के पूर्वी भाग में स्थित महत्वपूर्ण नदी है।
  • इस प्रकार कुणिन्द जनपद का क्षेत्र केवल पर्वतीय भू-भाग तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें हिमालय की आन्तरिक घाटियाँ, शिवालिक क्षेत्र तथा उनसे जुड़े मैदानी भू-भाग भी सम्मिलित थे। इसका विस्तृत क्षेत्रीय फैलाव कुणिन्दों के राजनीतिक प्रभाव एवं मध्य हिमालय में उनके महत्त्वपूर्ण स्थान को दर्शाता है।

निष्कर्ष

अतः उपलब्ध साहित्यिक एवं पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर कुणिन्द जनपद का चरम विस्तार उत्तर में हिमालय की आन्तरिक घाटियों से लेकर दक्षिण में बेहट (सहारनपुर) तथा पश्चिम में सतलज से पूर्व में काली नदी तक माना जा सकता है। इसका विस्तृत क्षेत्रीय विस्तार कुणिन्दों की राजनीतिक शक्ति, भौगोलिक महत्त्व और मध्य हिमालय में उनकी प्रभावशाली स्थिति को स्पष्ट करता है।

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