पौराणिक एवं वैदिक काल में गढ़वाल क्षेत्र|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

उत्तराखण्ड का गढ़वाल क्षेत्र प्राचीन काल से ही धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक एवं पौराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। प्राचीन ग्रंथों में इसे मुख्यतः बद्रीकाश्रम, तपोभूमि और केदारखण्ड जैसे नामों से संबोधित किया गया है। हिमालय की ऊँची पर्वतशृंखलाओं, गंगा की प्रमुख धाराओं और अनेक तीर्थस्थलों से युक्त यह क्षेत्र वैदिक परंपराओं, ऋषि-आश्रमों, प्राचीन जनजातियों तथा महाभारत-रामायण से संबंधित परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। बद्रीकाश्रम और कण्वाश्रम जैसे प्राचीन विद्याकेंद्रों तथा केदारनाथ, देवप्रयाग और बद्रीनाथ जैसे तीर्थों के कारण गढ़वाल ने उत्तराखण्ड की प्राचीन सांस्कृतिक पहचान को विशेष रूप से आकार दिया।

प्रमुख तथ्य

  • क्षेत्र के प्राचीन नाम बद्रीकाश्रम क्षेत्र, तपोभूमि व केदारखण्ड।
  • केदारखण्ड में गढ़वाल की सीमाओं की लम्बाई 50 योजन (200 मील) व चौड़ाई 30 योजन (120 मील) बतायी गयी है।
  • केदारखण्ड व मानसखण्ड की सीमाओं का विभाजन बधाण क्षेत्र या नन्दादेवी पर्वत करता है।
  • केदारखण्ड गंगाद्वार से हिमालय व तमसा या टौंस नदी से बौद्धांचल या नन्दादेवी तक फैला हुआ है।
  • राजा अजयपाल ने 52 गढ़ों को जीता था तब से इस क्षेत्र को गढ़वाल कहा जाता था।
  • हरिदत्त भट्ट शैलेश ने गढ़वाल शब्द की उत्पत्ति का सम्बन्ध इस क्षेत्र में बहने वाली छोटी-छोटी गाड़ों से किया है।
  • ऋग्वेद के अनुसार इस क्षेत्र में असुर राजा शम्बर के 100 गढ़ों को इन्द्र व सुदास ने नष्ट किया था।
  • ऋग्वेद के अनुसार इस क्षेत्र के प्राणा (माणा) गाँव में प्रलय के बाद सप्त ऋषियों ने अपने प्राणों की रक्षा की।
  • गढ़वाल क्षेत्र में कुबेर की राजधानी अलकापुरी थी और अलकापुरी में मनुष्यों के आदिपूर्वज मनु का निवास स्थान था।
  • ब्रह्मा के मानस पुत्रों दक्ष, मरीचि,पुलस्त्य, पुलह, ऋतु और अत्रि का निवास स्थल गढ़वाल ही था।
  • हरिराम धस्माना, भजन सिंह और डॉ शिवानंद नौटियाल आदि इतिहासकारों का मत है कि ऋग्वेद में जो सप्तसिंधु देश का उल्लेख है वह गढ़भूमि (गढ़वाल)ही है।
  • महाभारत के अनुसार इस क्षेत्र मे खश, तंगण, किम्मपुरुष आदि जनजातियाँ भी निवास करती थी।
  • गढ़वाल क्षेत्र के बद्रीनाथ के पास गणेश, नारद, मुचकुंद, व्यास व स्कंद गुफा में वैदिक ग्रंथों की रचना हुई थी।
  • टिहरी गढ़वाल के हिमयाण पट्टी स्थित विसोन पर्वत पर वशिष्ठ गुफा, वशिष्ठ कुंड एवं वशिष्ठ आश्रम है।
  • गढ़वाल क्षेत्र के देवप्रयाग की सितोनस्यू पट्टी में सीता जी पृथ्वी में समायी थी।इसी कारण यहां (मनसार मे ) प्रतिवर्ष मेला लगता है।
  • देवप्रयाग में भगवान राम का एक मंदिर है, यहाँ भगवान राम ने अंतिम समय मे शिव भगवान की तपस्या की थी।
  • टिहरी गढ़वाल जिले मे के लक्ष्मण जी ने जिस स्थान पर तपस्या किया था उसे तपोवन कहा जाता है।
  • रामायणकालीन बाणासुर का राज्य गढ़वाल क्षेत्र में था। इसकी राजधानी ज्योतिषपुर या जोशीमठ थी।
  • महाभारत के वन पर्व में केदारनाथ को भृंगतुंग कहा गया है।
  • महाभारत के वन पर्व के अनुसार उस समय गढ़वाल क्षेत्र में पुलिंद (कुणिंद) व किरात जातियों का आधिपत्य था।
  • महाभारत के सभापर्व, वन पर्व या आरण्यक पर्व एवं भीष्म पर्व में कुणिंदों की जानकारी मिलती है।
  • पुलिंद राजा सुबाहु की राजधानी श्रीनगर थी, जो महाभारत के युद्ध में पाण्डवों की तरफ से लड़ा था।
  • राजा विराट जिसकी राजधानी जौनसार के विराटगढ़ी में थी, उसकी पुत्री उत्तरा से अभिमन्यु का विवाह हुआ था।
  • महाभारत में देवप्रयाग को समस्त तीर्थों का शिरोमणि व समस्त पापों का विनाशक कहा गया है।
  • श्रीनगर को महाभारत में सुबाहुपुर व श्रीक्षेत्र कहा गया है।
  • आदिपर्व के अनुसार अर्जुन का विवाह नागराज कौरव्य की कन्या उलूपी से गंगाद्वार में हुआ था।
  • महाभारत काल में गंगाद्वार में नागराज कौरव्य का तथा श्रीनगर में सुबाहु व मन्दाकिनी के उत्तर में असुर बाणासुर का शासन था।
  • वन पर्व के अनुसार लोमश ऋषि के साथ पाण्डव गढ़वाल क्षेत्र में आये थे।
  • प्राचीन काल में गढ़वाल क्षेत्र में बद्रीकाश्रम व कण्वाश्रम दो प्रसिद्ध विद्यापीठ थे।
  • ऋग्वेद में उत्तराखण्ड क्षेत्र का नाम उशीनगर भी मिलता है और बौद्ध साहित्य में महात्मा बुद्ध का उश्रिध्वज जाने का उल्लेख मिलता है, जिसकी पहचान कनखल से की जाती है।

प्राचीन विद्यापीठ कण्वाश्रम

  • कण्वाश्रम पौड़ी जनपद (कोटद्वार) में स्थित दुष्यन्त व शकुन्तला के प्रेम प्रसंग के कारण प्रसिद्ध है। शकुन्तला गुरु विश्वामित्र व अप्सरा मेनका की पुत्री थी और राजा दुष्यन्त हस्तिनापुर के शासक थे।
  • कण्वाश्रम में चक्रवर्ती सम्राट राजा भरत का जन्म हुआ था।
  • कण्वाश्रम में महाकवि कालिदास ने अभिज्ञानशाकुन्तलम् ग्रंथ की रचना की।यह मालिनी नदी के तट पर स्थित है।
  • कण्वाश्रम का वर्तमान नाम चौकाघाटा है और कण्वाश्रम के कारण कोटद्वार नगर निगम का नया नाम कण्वनगरी करने का प्रस्ताव रखा गया।
  • कण्वाश्रम या चौकीघाटा में बसंत पंचमी के दिन मेला लगता है।
  • उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री डॉ. सम्पूर्णानन्द ने सन् 1955 में इस स्थान का पुनरुद्धार करने हेतु यहाँ पर मालिनी नदी के तटस्थ टीले पर एक छोटा-सा मंदिर बनवाया था।
  • धार्मिक ग्रंथो मे कही-कही केदारखसमण्डले शब्द का प्रयोग किया गया है। इस शब्द के अनुरूप केदारखंड को खस प्रदेश का प्रर्यावाची माना गया है। विद्वानों का मत है कि प्राचीन काल मे गढ़वाल क्षेत्र मे खस जाति के लोग बहुत सशक्त थे। खसो के समय गढ़वाल क्षेत्र मे बौद्ध मत का प्रचार-प्रसार अधिक हुआ था। कुछ विद्वान इन्हे आर्य मानते है।

निष्कर्ष

अतः गढ़वाल क्षेत्र को केवल एक भौगोलिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि उत्तराखण्ड की प्राचीन धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना के प्रमुख केंद्र के रूप में समझना चाहिए। वैदिक एवं पौराणिक परंपराओं, ऋषि-आश्रमों, प्राचीन जनजातीय उपस्थिति, महाभारतकालीन कथाओं तथा कण्वाश्रम जैसे ज्ञान-केंद्रों से जुड़ी परंपराएँ इसकी ऐतिहासिक महत्ता को दर्शाती हैं। समय के साथ इसकी राजनीतिक एवं भौगोलिक सीमाओं में परिवर्तन हुआ, किंतु केदारखण्ड की धार्मिक परंपरा और गढ़भूमि की सांस्कृतिक पहचान आज भी उत्तराखण्ड की विरासत का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है।

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