व्यक्तिगत सत्याग्रह एवं उत्तराखंड
परिचय
व्यक्तिगत सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्त्वपूर्ण अहिंसक आंदोलन था, जिसे महात्मा गांधी ने 1940 में शुरू किया। इसका उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीयों की सहमति के बिना भारत को शामिल करने का विरोध करना तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करना था। इस आंदोलन में उत्तराखंड के कुमाऊँ और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों के नेताओं, कार्यकर्ताओं और महिलाओं ने भाग लिया। गढ़वाल में व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान डोला-पालकी की समस्या के कारण आंदोलन पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगा, जिसे बाद में गांधी जी ने हटा दिया।
व्यक्तिगत सत्याग्रह की शुरुवात
- व्यक्तिगत सत्याग्रह महात्मा गांधी द्वारा 17 अक्टूबर, 1940 को अगस्त प्रस्ताव की अस्वीकृति के बाद शुरू किया गया सीमित एवं अहिंसक आंदोलन था। इसका उद्देश्य भारतीयों की सहमति के बिना भारत को द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल करने का विरोध करना तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की माँग करना था। विनोबा भावे इसके प्रथम सत्याग्रही थे, जिन्होंने पवनार (वर्धा, महाराष्ट्र) से सत्याग्रह शुरू किया, जबकि जवाहरलाल नेहरू दूसरे सत्याग्रही थे।
- उत्तराखंड के प्रथम व्यक्तिगत सत्याग्रही जगमोहन सिंह नेगी थे।
- उत्तराखंड में व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए स्वयं को सत्याग्रही घोषित करने वाली पहली महिला भागीरथी देवी थीं।
कुमाऊँ में व्यक्तिगत सत्याग्रह
- कुमाऊँ में व्यक्तिगत सत्याग्रह का शुभारंभ पंडित गोविंद बल्लभ पंत ने हल्द्वानी में किया। 24 नवंबर, 1940 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
- अल्मोड़ा जनपद में व्यक्तिगत सत्याग्रह की शुरुआत 6 दिसंबर, 1940 को हरगोविंद पंत ने स्वराज मंदिर, बागेश्वर से की।
- नैनीताल जनपद में पंडित गोविंद बल्लभ पंत के बाद दिसंबर, 1940 में मोहनलाल शाह सत्याग्रही बने।
- वर्ष 1940–41 के व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान महिलाओं ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया। हल्द्वानी में शोभावती मित्तल और भागीरथी देवी, जबकि काशीपुर में यशोधरा देवी ने सत्याग्रही के रूप में गिरफ्तारी दी।
गढ़वाल में व्यक्तिगत सत्याग्रह
- गढ़वाल जनपद में व्यक्तिगत सत्याग्रह को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए 28 दिसंबर, 1940 को डाडामंडी, पौड़ी में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का सम्मेलन आयोजित किया गया। सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव के अनुसार, 6 जनवरी, 1941 को गढ़वाल क्षेत्र के विधायकों जगमोहन सिंह नेगी और अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में सत्याग्रह शुरू किया।
- जगमोहन सिंह नेगी को गढ़वाल का प्रथम सत्याग्रही कहा जाता है।
- जगमोहन सिंह नेगी ने लैंसडाउन में तथा अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने नंदप्रयाग में ब्रिटिश शासन के विरोध में भाषण देकर गिरफ्तारियाँ दीं और सत्याग्रह का सूत्रपात किया।
- व्यक्तिगत सत्याग्रह के लिए धन-संग्रह के उद्देश्य से कृपाराम मिश्र के संयोजन में एक समिति बनाई गई।
- डोला-पालकी की समस्या और उससे उत्पन्न विवादों के कारण 25 जनवरी, 1941 को महात्मा गांधी ने गढ़वाल में व्यक्तिगत सत्याग्रह पर प्रतिबंध लगा दिया।
- 6 जनवरी, 1941 को रमेशचंद्र बहुखंडी ने गांधी जी को पत्र लिखकर डोला-पालकी की समस्या से अवगत कराया।
- डोला-पालकी की समस्या की जाँच के लिए पूर्णचंद विद्यालंकार गढ़वाल आए।
- 23 फरवरी, 1941 को लैंसडाउन में डोला-पालकी की समस्या का समाधान निकालने के लिए सर्वदलीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता हरेंद्र सिंह रावत ने की। सम्मेलन में उपस्थित 140 व्यक्तियों ने प्रतिज्ञा-पत्र पर हस्ताक्षर करके वचन दिया कि भविष्य में हरिजनों की बारातों में डोला-पालकी रोकने की घटनाएँ नहीं होंगी।
- 28 फरवरी, 1941 को प्रताप सिंह नेगी के नेतृत्व में भक्ति दर्शन, श्रीदेव सुमन, रमेशचंद्र बहुखंडी और कमल सिंह सहित गढ़वाल का एक शिष्टमंडल इलाहाबाद में गांधी जी से मिला। शिष्टमंडल ने गांधी जी को विश्वास दिलाया कि गढ़वाल में भविष्य में डोला-पालकी से संबंधित ऐसी घटनाएँ नहीं होने दी जाएँगी।
- 12 मार्च, 1941 को गांधी जी ने गढ़वाल में व्यक्तिगत सत्याग्रह पर लगाया गया प्रतिबंध हटा दिया।
निष्कर्ष
व्यक्तिगत सत्याग्रह ने उत्तराखंड में स्वतंत्रता आंदोलन को नई गति प्रदान की। कुमाऊँ और गढ़वाल के नेताओं के साथ महिलाओं ने भी ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सक्रिय भागीदारी की। गढ़वाल में डोला-पालकी विवाद ने आंदोलन को अस्थायी रूप से प्रभावित किया, लेकिन सामाजिक समरसता स्थापित करने के प्रयासों के बाद प्रतिबंध हटा लिया गया। इस प्रकार व्यक्तिगत सत्याग्रह ने स्वतंत्रता की माँग के साथ सामाजिक सुधार के प्रश्नों को भी सामने रखा।