गोरखों की कर-नीति

परिचय

गोरखा शासन में कर-व्यवस्था राजस्व प्राप्ति का प्रमुख साधन थी। किसी भी राज्य के संचालन के लिए सुदृढ़ राजकोष आवश्यक होता है, इसलिए गोरखा शासकों ने उत्तराखंड की रैयत पर विभिन्न प्रकार के कर लगाए। उन्होंने चंदकालीन अनेक करों को जारी रखा तथा अपनी प्रशासनिक और आर्थिक आवश्यकताओं के अनुसार कुछ नए कर भी लगाए। भूमि, व्यवसाय, संपत्ति, पशुधन, उत्सव, हस्तांतरण और विभिन्न सामाजिक गतिविधियों पर अलग-अलग प्रकार के कर वसूले जाते थे। इन करों का बोझ सामान्य जनता पर काफी अधिक था। कर चुकाने में असमर्थ लोगों के साथ कठोर व्यवहार किया जाता था, जिससे गोरखा कर-व्यवस्था का स्वरूप कठोर और शोषणकारी माना जाता है।

प्रमुख तथ्य

  • गोरखा शासकों के लिए राजकोष को समृद्ध रखना आवश्यक था। इसलिए रैयत पर अनेक प्रकार के कर लगाए गए और यही कर राज्य की आय के प्रमुख साधन बने।
  • गोरखों से पहले चंद शासकों ने भी ‘छत्तीस रकम और बत्तीस कलम’ के अंतर्गत अनेक कर लगाए थे। गोरखों ने इनमें से कुछ करों को जारी रखा और आवश्यकता के अनुसार नए कर लगाए।
  • चंद राजा लक्ष्मी चंद के समय करों का बोझ इतना अधिक बताया जाता है कि लोगों ने घरों की छतों पर मिट्टी डालकर शाक-सब्जियाँ उगाना शुरू कर दिया था।
  • गोरखों द्वारा लगाए गए नए करों में ‘कुसही’ प्रमुख था। यह ब्राह्मणों पर लगाया जाता था। 13 ज्यूलिया अर्थात लगभग 260 नाली तक भूमि रखने वाले ब्राह्मणों से पाँच रुपये प्रति मवासा लिया जाता था।
  • गढ़वाल और कुमाऊँ में छत पर चढ़ने वाली महिलाओं पर भी जुर्माने के रूप में कर लगाए जाने का उल्लेख मिलता है।
  • पुंगाड़ी — यह एक प्रकार का भूमिकर था। इससे लगभग डेढ़ लाख रुपये वार्षिक आय होने का उल्लेख मिलता है। इससे सैनिकों के वेतन का भुगतान किया जाता था।
  • सलामी — यह एक प्रकार का नजराना था।
  • टीका भेंट — शुभ अवसरों तथा शादी-विवाह के अवसर पर लिया जाने वाला कर था।
  • तिमारी — इस कर के साथ फौजदार को चार आना तथा सूबेदार को दो आना देना पड़ता था। 1811 ई. में काजी बहादुर भंडारी और दशरथ खन्वी ने इसकी दर निर्धारित की थी, लेकिन व्यवहार में इसका नियमित पालन नहीं होता था।
  • पगरी (पगड़ी) — गोरखा सनदों में इसका बार-बार उल्लेख मिलता है। इसे संभवतः भूमि या संपत्ति के हस्तांतरण के समय संपत्ति प्राप्त करने वाले व्यक्ति से एकमुश्त राशि के रूप में लिया जाता था।
  • मांगा — प्रत्येक नौजवान से एक रुपया लिया जाता था। युद्ध के समय इसे तत्कालीन/अतिरिक्त कर के रूप में भी वसूला जाता था।
  • सुवांगी दस्तूर — प्रत्येक बीसी भूमि पर एक रुपया लिया जाता था।
  • मेजबानी दस्तूर — इसके रूप में ढाई आना लिया जाता था।
  • सोन्या फागुन — उत्सवों के खर्च से संबंधित कर था। इसमें भैंसे और बकरे लिए जाते थे। सावन, दशाई (दशहरा) और फागुन के अवसरों पर पशुबलि की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है।
  • टान कर — इसे तान (कपड़ा) कर भी कहा जाता था। यह हिंदू और भोटिया बुनकरों से लिया जाता था।
  • मिझारी — यह कर शिल्पकारों तथा जागरिया ब्राह्मणों से लिया जाता था।
  • मरो — यह कर पुत्रहीन व्यक्तियों से लिया जाता था।
  • रहता — गाँव छोड़कर भाग जाने वाले लोगों पर लगाया जाने वाला कर था।
  • बहता — छिपाई गई संपत्ति पर लगाया जाने वाला कर था।
  • घीकर — दुधारू पशुओं के मालिकों से लिया जाने वाला कर था।
  • मौकर — यह प्रति परिवार दो रुपये का कर था। इसे चंद शासकों द्वारा भी लगाया गया था। इसे घरही-पिछही भी कहा जाता था।
  • अधनी दफ्तरी — राजस्व संबंधी कार्य करने वाले कर्मचारियों के वेतन के लिए खस जमींदारों से लिया जाने वाला कर था।
  • जान्या-सुन्या — राजस्व अथवा लगान के संबंध में राजकर्मचारियों से पूछताछ करने पर लगाया जाने वाला कर था।
  • उपर्युक्त करों के अतिरिक्त ऊपरी रकम, वक्ष्यात (बख्शीस), कल्याण धन, केरू, घररु और खुना आदि विभिन्न प्रकार के कर एवं शुल्क भी लिए जाते थे।
  • गोरखा शासन में गोबर और पुछिया नाम के करों का भी उल्लेख मिलता है।
  • भाबर के हेडी और मेवाती क्षेत्रों में पहाड़ी पशुचारकों से ‘दोनिया’ नामक कर वसूल किया जाता था।
  • काश्तकारों से कर ठेकाबंदी के आधार पर वसूल किया जाता था।
  • कर-व्यवस्था की कठोरता का सबसे गंभीर उदाहरण यह था कि राजकर चुकाने में असमर्थ व्यक्तियों को मैदान की विभिन्न मंडियों में ले जाकर बेचे जाने का उल्लेख मिलता है। उनकी कीमत लगभग 10 से 30 रुपये तक बताई गई है।
  • ऐसे व्यक्तियों को प्रायः जोहार-मुनस्यारी और दारमा घाटी के शौका खरीदते थे। उनका उपयोग भेड़ों की करबज (थैलियाँ) सिलने तथा उनमें आलू, नमक, सुहागा, गंदरायन, जिंबू आदि भरने के कार्य में किया जाता था।
  • सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले कुछ खस और नामगी समुदायों के वहाँ बसने को भी इसी प्रकार की ऐतिहासिक परिस्थितियों से जोड़ा गया है। नामगी भोटियों के पुरोहित माने जाते थे।
  • गोरखा काल की कर-व्यवस्था से स्पष्ट होता है कि राज्य ने भूमि, परिवार, पशुधन, व्यवसाय, संपत्ति, सामाजिक गतिविधियों और विभिन्न अवसरों को राजस्व प्राप्ति के आधार के रूप में उपयोग किया।

निष्कर्ष

गोरखों की कर-नीति का मुख्य उद्देश्य राजकोष को मजबूत करना और प्रशासन तथा सेना के खर्च की पूर्ति करना था। उन्होंने चंदकालीन करों को जारी रखने के साथ अनेक नए कर और शुल्क भी लगाए। पुंगाड़ी, सलामी, टीका भेंट, तिमारी, पगरी, मांगा, मौकर, घीकर, टान कर और मरो जैसे विभिन्न करों ने जनता पर आर्थिक भार बढ़ाया। सैनिक व्यय की पूर्ति के लिए भी करों का महत्वपूर्ण उपयोग किया जाता था। कर वसूली की कठोरता तथा कर न चुका पाने वालों के साथ किए जाने वाले अमानवीय व्यवहार के कारण गोरखा कर-व्यवस्था को उत्तराखंड के इतिहास में शोषणकारी और कठोर आर्थिक व्यवस्था के रूप में देखा जाता है। इस कर-नीति ने गोरखा शासन के प्रति जनता में असंतोष को बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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