तीलू रौतेली — गढ़वाल की लक्ष्मीबाई, गढ़वाल की जोन ऑफ आर्क

परिचय

तीलू रौतेली उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र की प्रसिद्ध वीरांगना थीं, जिन्हें उनकी अदम्य वीरता, साहस और संघर्ष के कारण “गढ़वाल की लक्ष्मीबाई” तथा “गढ़वाल की जोन ऑफ आर्क” कहा जाता है। प्रचलित विवरणों के अनुसार उनका मूल नाम तिलोत्तमा देवी था और उनका जन्म 8 अगस्त 1661 को पौड़ी गढ़वाल के चौंदकोट क्षेत्र के गुराड़ गाँव में हुआ था। लोकगाथाओं में उनके द्वारा कम उम्र में ही शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध का नेतृत्व करने और लगभग सात वर्षों तक संघर्ष करने का उल्लेख मिलता है। उनकी वीरता से जुड़ी बिंदुली घोड़ी, बेलू और देवकी जैसी सहेलियाँ तथा अनेक युद्ध-कथाएँ गढ़वाल की लोकसंस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

तीलू रौतेली प्रमुख तथ्य

  • तीलू रौतेली उत्तराखंड की प्रसिद्ध वीरांगना थीं, जिन्हें “गढ़वाल की लक्ष्मीबाई” तथा “गढ़वाल की जोन ऑफ आर्क” के नाम से जाना जाता है।
  • तीलू रौतेली का मूल नाम तिलोत्तमा देवी माना जाता है।
  • प्रचलित विवरणों के अनुसार, उनका जन्म 8 अगस्त 1661 को हुआ था।
  • उनका जन्मस्थान गुराड़ गाँव, चौंदकोट, पौड़ी गढ़वाल माना जाता है।
  • उनके पिता का नाम भूप सिंह रावत (गोर्ला) तथा माता का नाम मैणावती बताया जाता है।
  • उनके भाइयों के नाम भगतु और पत्वा बताए जाते हैं।-
  • तीलू रौतेली के मंगेतर का नाम भवानी सिंह नेगी बताया जाता है।
  • उनकी प्रसिद्ध घोड़ी का नाम बिंदुली था। लोकप्रचलित कथाओं के अनुसार, सराईखेत के युद्ध में बिंदुली मारी गई थी।
  • तीलू रौतेली की दो प्रमुख सहेलियों के नाम बेलू और देवकी बताए जाते हैं।
  • लोकगाथाओं के अनुसार, तीलू रौतेली ने कम उम्र में ही गढ़वाल क्षेत्र में शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध का नेतृत्व किया।
  • लोकप्रचलित कथाओं के अनुसार, उन्होंने लगभग सात वर्षों तक संघर्ष किया।
  • लोकमान्यताओं के अनुसार, तीलू रौतेली ने 13 गढ़ों पर विजय प्राप्त की थी।
  • तीलू रौतेली की मृत्यु की प्रचलित तिथि 15 मई 1683 मानी जाती है।
  • उनकी मृत्यु पूर्वी नयार नदी के निकट मानी जाती है। लोककथा के अनुसार, रामू रजवार नामक कत्युरी सैनिक ने छलपूर्वक नदी में स्नान करते समय उनकी हत्या कर दी थी।
  • तीलू रौतेली की वीरता, साहस और युद्ध-कौशल की गाथाएँ उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और लोकगाथाओं में आज भी प्रचलित हैं।
  • उत्तराखंड सरकार द्वारा महिलाओं के उल्लेखनीय योगदान को सम्मानित करने के लिए तीलू रौतेली राज्य स्त्री शक्ति पुरस्कार प्रदान किया जाता है।
  • तीलू रौतेली को उत्तराखंड में वीरता, साहस और बलिदान की प्रतीक के रूप में याद किया जाता है।
  • प्रचलित विवरणों के अनुसार, तीलू रौतेली बाजबहादुर चंद तथा उद्योत चंद के समकालीन थीं।
  • लोकप्रचलित ऐतिहासिक विवरणों में तीलू रौतेली की हत्या को गढ़वाल के इतिहास का महाकलंक कहा गया है।
  • तीलू रौतेली के जन्म, मृत्यु, युद्धों की संख्या तथा जीवन की अन्य घटनाओं से संबंधित अनेक विवरण लोकगाथाओं, जनश्रुतियों और प्रचलित ऐतिहासिक परंपराओं पर आधारित हैं। इसलिए इन तथ्यों को प्रस्तुत करते समय लोकमान्यता और प्रमाणित इतिहास के बीच अंतर को ध्यान में रखना आवश्यक है।

निष्कर्ष

तीलू रौतेली गढ़वाल की लोकपरंपरा में अदम्य साहस, वीरता, नेतृत्व और बलिदान की प्रतीक हैं। कम आयु में शत्रुओं के विरुद्ध संघर्ष करने की उनकी गाथा ने उन्हें उत्तराखंड की सबसे प्रसिद्ध वीरांगनाओं में स्थान दिलाया। उनकी घोड़ी बिंदुली, सहेलियाँ बेलू और देवकी, 13 गढ़ों पर विजय तथा लगभग सात वर्षों के संघर्ष से जुड़ी कथाएँ आज भी लोकस्मृति में जीवित हैं। उत्तराखंड सरकार द्वारा दिया जाने वाला तीलू रौतेली राज्य स्त्री शक्ति पुरस्कार भी उनके नाम को सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है। परीक्षा की दृष्टि से तिलोत्तमा देवी, गुराड़ गाँव, भूप सिंह रावत, मैणावती, बिंदुली, 13 गढ़ और 15 मई 1683 जैसे तथ्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। उनके जीवन से जुड़े कई विवरण लोकगाथाओं पर आधारित होने के कारण उन्हें उसी संदर्भ में समझना उचित है।

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