टिहरी नरेशों का प्रशासन
परिचय
टिहरी राज्य में प्रशासन एक केंद्रीकृत एवं क्रमबद्ध व्यवस्था पर आधारित था। प्रशासन का सर्वोच्च केंद्र राजा था, जिसके अधीन मंत्रिपरिषद, दीवान, वजीर तथा विभिन्न राजकीय अधिकारी कार्य करते थे। राजा को राज्य की प्राकृतिक एवं स्थावर-जंगम संपत्तियों पर सर्वोच्च अधिकार प्राप्त था और राजकीय कर्मचारियों की नियुक्ति भी उसी के द्वारा की जाती थी। प्रशासनिक सुविधा के लिए राज्य को विभिन्न प्रादेशिक इकाइयों में विभाजित किया गया था। सुदर्शन शाह के समय राज्य को चार ठाणों में बाँटा गया था तथा आगे परगना, पट्टी और गाँव प्रशासन की महत्वपूर्ण इकाइयाँ थीं।
1. केंद्रीय प्रशासन
राजा
- टिहरी नरेश राज्य के सर्वोच्च शासक होते थे। राज्य की समस्त प्रशासनिक शक्तियाँ राजा में निहित थीं।
- राज्य की समस्त प्राकृतिक, स्थावर एवं जंगम संपत्ति—जैसे भूमि, वन, खनिज, जल, बनेले, पशु-पक्षी आदि—पर राजा का ‘सत्व’ अर्थात् हक-मिल्कियत माना जाता था।
- राज्य के समस्त राजकीय कर्मचारियों की नियुक्ति राजा द्वारा की जाती थी।
- राजा मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष होता था।
- राजा की आज्ञा सर्वोपरि मानी जाती थी और राजकीय प्रशासन उसके आदेशों के अनुसार संचालित होता था।
- राजा कार्यपालिका एवं न्यायपालिका दोनों का अध्यक्ष था। इस प्रकार प्रशासन और न्याय दोनों क्षेत्रों में राजा की सर्वोच्च भूमिका थी।
दीवान एवं वजीर
- टिहरी राज्य के प्रशासन में दीवान एवं वजीर सर्वोच्च अधिकारियों में शामिल थे।
- राज्य के समस्त विभाग एवं उनके कार्यालय वजीर के अधीन कार्य करते थे।
- राज्य की आंतरिक व्यवस्था एवं प्रशासनिक नीतियों के निर्धारण में दीवान एवं वजीर की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
2. प्रादेशिक प्रशासन
- सुदर्शन शाह के शासनकाल में प्रशासनिक सुविधा के लिए टिहरी राज्य को चार ठाणों में विभाजित किया गया था।
- प्रत्येक ठाणे का प्रमुख अधिकारी ठाणेदार (थानेदार) कहलाता था।
- टिहरी राज्य की प्रशासनिक संरचना क्रमशः इस प्रकार थी—ठाणा → परगना → पट्टी → गाँव
परगना
- परगने की प्रशासनिक व्यवस्था देखने वाले अधिकारी को ‘सुपरवाइजर’ कहा जाता था।
- सुपरवाइजर का पद ब्रिटिश गढ़वाल के गिरदावर कानूनगो के समान माना जाता था।
पट्टी
- पटवारी राजस्व विभाग का अधिकारी होने के साथ-साथ पुलिस अधिकारी के रूप में भी कार्य करता था।
- पटवारी का प्रमुख कार्य अपनी पट्टी के पधानों से निर्धारित राजस्व की राशि वसूल करवाकर तहसील में जमा करवाना था।
गाँव
- प्रत्येक गाँव से राजस्व वसूलने के लिए पधान नियुक्त होते थे।
- पधान की नियुक्ति गाँव के मौरूसीदारों में से की जाती थी।
ठाणा — ठाणेदार
परगना — सुपरवाइजर
पट्टी — पटवारी
गाँव — पधान
निष्कर्ष
टिहरी नरेशों की प्रशासनिक व्यवस्था में राजा सर्वोच्च सत्ता का केंद्र था। उसके पास कार्यपालिका एवं न्यायपालिका दोनों की सर्वोच्च शक्तियाँ थीं तथा राज्य की प्राकृतिक एवं अन्य संपत्तियों पर उसका अधिकार माना जाता था। दीवान एवं वजीर केंद्रीय प्रशासन के प्रमुख अधिकारी थे। प्रादेशिक स्तर पर ठाणा, परगना, पट्टी और गाँव की क्रमबद्ध व्यवस्था थी। ठाणेदार, सुपरवाइजर, पटवारी और पधान क्रमशः विभिन्न स्तरों पर प्रशासन एवं राजस्व व्यवस्था को संचालित करते थे। इस प्रकार टिहरी राज्य में केंद्रीय राजसत्ता और स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों के समन्वय से शासन व्यवस्था संचालित होती थी।