राजा भवानी शाह (1859–1871) |Tihari Risayat of Garhwal|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
राजा भवानी शाह पंवार/परमार वंश के 56वें तथा टिहरी गढ़वाल रियासत के दूसरे राजा थे। उनका शासनकाल 1859 से 1871 ई. तक रहा। वे राजा सुदर्शन शाह के उत्तराधिकारी थे। सुदर्शन शाह ने अपने जीवनकाल में ही भवानी शाह को टीका कुमार घोषित कर दिया था, किंतु उनके निधन के बाद भवानी शाह और उनके छोटे भाई शेरशाह के बीच उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष उत्पन्न हुआ। अंततः ब्रिटिश हस्तक्षेप से भवानी शाह को राजगद्दी प्राप्त हुई। उनके शासन के प्रारंभिक वर्षों में जौनपुर और रवाई क्षेत्रों में अशांति एवं विद्रोह हुए, जिन्हें नियंत्रित करने के बाद राज्य में सामान्यतः शांति बनी रही। भवानी शाह अपनी तीर्थयात्राओं, दानशीलता तथा धार्मिक कार्यों के लिए भी प्रसिद्ध थे।
1. उत्तराधिकार एवं राज्यारोहण
- राजा भवानी शाह पंवार/परमार वंश के 56वें तथा टिहरी रियासत के दूसरे राजा थे।
- उनका शासनकाल 1859 से 1871 ई. तक रहा।
- भवानी शाह का जन्म कांगड़ा के कटोच कुल की कन्या गुणदेवी से हुआ था।
- राजा सुदर्शन शाह ने अपने जीवनकाल में ही भवानी शाह को ‘टीका कुमार’ घोषित कर दिया था।
- सुदर्शन शाह की मृत्यु के बाद भवानी शाह और उनके छोटे भाई शेरशाह के बीच राजगद्दी को लेकर संघर्ष हुआ।
- संघर्ष के दौरान कुछ समय के लिए शेरशाह ने सत्ता अपने हाथ में ले ली थी।
- इस राजनीतिक संघर्ष के दौरान राज्य का राजपाट तहसीलदार जीवानंद द्वारा संभाला गया।
- अंततः ब्रिटिश सरकार के हस्तक्षेप से भवानी शाह को राजगद्दी प्राप्त हुई।
- उत्तराधिकार के इस संघर्ष का अंत कुमाऊँ कमिश्नर हेनरी रैमजे (Henry Ramsay) के हस्तक्षेप से हुआ।
- हेनरी रैमजे टिहरी आए और 6 सितंबर 1859 ई. की सनद द्वारा भवानी शाह को राज्य का भार सौंपे जाने की घोषणा की।
- 6 सितंबर 1859 ई. से भवानी शाह को टिहरी का राजा माना गया।
- 25 अक्टूबर 1859 ई. को भवानी शाह का राज्याभिषेक हुआ।
- विद्रोह की आशंका के कारण कमिश्नर रैमजे ने शेरशाह को देहरादून में बंदी रखा।
2. प्रारंभिक विद्रोह एवं शासन-प्रबंध
- भवानी शाह अपने पिता सुदर्शन शाह की तुलना में राजनीतिक एवं प्रशासनिक दृष्टि से उतने कुशल नहीं माने जाते थे।
- उनके शासन के प्रारंभिक वर्षों में राज्य के कुछ दूरस्थ क्षेत्रों में अशांति एवं विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हुई।
- जौनपुर विद्रोह: राज्यारोहण के प्रारंभिक समय में शेरशाह तथा उसके समर्थकों ने जौनपुर परगने के निवासियों को भवानी शाह के विरुद्ध भड़काया।
- ब्रिटिश सरकार की सहायता प्राप्त होने के बाद जौनपुर का विद्रोह शांत हो गया।
- रवाई विद्रोह: भवानी शाह के शासनकाल में रवाई क्षेत्र में भी विद्रोह हुआ।
- रवाई विद्रोह का नेतृत्व बलभद्र बिष्ट और नंदराम ने किया।
- रवाई में विद्रोह का कारण राज्य पदाधिकारियों की असावधानी एवं प्रशासनिक अव्यवस्था को बताया जाता है।
- भवानी शाह ने ससैन्य रवाई पहुंचकर विद्रोह का दमन किया।
- प्रारंभिक अशांति की इन घटनाओं के बाद भवानी शाह के शासनकाल में सामान्यतः शांति बनी रही।
3. भूमि-व्यवस्था एवं राजस्व संबंधी कार्य
- 1861 ई. में हेनरी रैमजे ने अठूर के कृषकों के लिए ‘बारह आना बीसी’ की भू-व्यवस्था करवाई।
- इस व्यवस्था के बाद अठूर क्षेत्र की प्रजा की असंतुष्टि शांत हुई।
- भवानी शाह के समय राज्य की आय के कुछ अन्य स्रोतों में गंगाजल विक्रय के ठेके, पहाड़ी कागज के विक्रय तथा अर्थदंड शामिल थे।
- इन स्रोतों से राज्य को अतिरिक्त आय प्राप्त होती थी।
- मियां प्रेम सिंह के अनुसार, भवानी शाह की मृत्यु के समय टिहरी के राजकोष में लगभग 3 लाख रुपये थे।
4. वन एवं शिकार संबंधी व्यवस्था
- भवानी शाह ने अंग्रेज शिकारी विल्सन को 1860 ई. में पुनः चार वर्ष के लिए शिकार का ठेका दिया।
- यह व्यवस्था उनके शासनकाल में राज्य की आय एवं वन-शिकार संबंधी नीतियों का एक हिस्सा थी।
5. शिक्षा एवं धार्मिक कार्य
- भवानी शाह अपनी तीर्थयात्राओं और दानशीलता के लिए प्रसिद्ध थे।
- 1862 ई. में देवप्रयाग में संस्कृत-हिंदी की प्रारंभिक पाठशाला खुलवाई गई।
- उनके शासनकाल में धार्मिक एवं शैक्षिक कार्यों को संरक्षण मिला।
6. शेरशाह से संबंध
- शेरशाह को प्रारंभ में कमिश्नर हेनरी रैमजे द्वारा देहरादून में बंदी रखा गया था।
- भवानी शाह ने स्वयं कमिश्नर से शेरशाह को मुक्त करने का अनुरोध किया।
- मुक्त होने के बाद शेरशाह टिहरी की राजधानी में रहने लगा।
- बाद में भवानी शाह ने अपने विमातृज भाइयों एवं विमाताओं के साथ मधुर संबंध बनाए रखे।
निष्कर्ष
राजा भवानी शाह का शासनकाल टिहरी रियासत के इतिहास में उत्तराधिकार संघर्ष, प्रारंभिक क्षेत्रीय विद्रोहों और बाद में स्थापित हुई शांति के लिए महत्वपूर्ण है। सुदर्शन शाह की मृत्यु के बाद भवानी शाह और शेरशाह के बीच उत्पन्न उत्तराधिकार विवाद का समाधान ब्रिटिश हस्तक्षेप से हुआ और 6 सितंबर 1859 की सनद तथा 25 अक्टूबर 1859 के राज्याभिषेक के बाद भवानी शाह ने औपचारिक रूप से शासन संभाला। उनके शासन के आरंभ में जौनपुर और रवाई में विद्रोह हुए, जिन्हें नियंत्रित किया गया। 1861 में अठूर कृषकों के लिए भूमि-व्यवस्था तथा 1862 में देवप्रयाग में संस्कृत-हिंदी पाठशाला की स्थापना उनके शासन के उल्लेखनीय कार्यों में रही। वे तीर्थयात्रा एवं दानशीलता के लिए भी प्रसिद्ध थे। शेरशाह की मुक्ति के लिए उनका स्वयं प्रयास करना उनके पारिवारिक संबंधों की उदारता को दर्शाता है।