राजा बलभद्र शाह (1575–1591 ई.)|Parmar/Panwar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

राजा बलभद्र शाह पंवार/परमार राजवंश के महत्वपूर्ण शासकों में से एक थे। उन्हें सामान्यतः वंश का 43वाँ शासक माना जाता है और उनका शासनकाल 1575 से 1591 ई. के बीच बताया जाता है। उनके नाम के विभिन्न रूप—बलराम, दुलाराम शाह, राम शाह और बहादुर शाह—स्रोतों में मिलते हैं, जिससे उनके व्यक्तित्व एवं शासन के अध्ययन में विशेष रुचि उत्पन्न होती है। उनके काल में गढ़वाल और मुगल सत्ता के बीच राजनयिक संपर्क विकसित होने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त ग्वालदम का युद्ध, श्रीनगर में चित्रशाला प्रासाद का निर्माण तथा मुगल स्रोतों में उनका उल्लेख उनके शासनकाल को गढ़वाल के राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण बनाते हैं।

प्रमुख बिंदु

  • बलभद्र शाह को पंवार/परमार वंश का 43वाँ राजा माना जाता है। उनका शासनकाल सामान्यतः 1575–1591 ई. माना जाता है।
  • सहजपाल के बाद सिंहासन पर आए बलभद्र शाह के अन्य नाम बलराम, दुलाराम शाह, राम शाह तथा बहादुर शाह मिलते हैं।
  • बलभद्र शाह को सामान्यतः वह शासक माना जाता है जिसने अपने नाम के आगे ‘शाह’ उपाधि का क्रमिक एवं नियमित प्रयोग प्रारंभ किया। हालांकि कल्याण शाह के नाम के साथ भी ‘शाह’ शब्द मिलता है।
  • भक्त दर्शन के अनुसार परमार शासकों को ‘शाह’ उपाधि औरंगजेब द्वारा प्रदान की गई थी। हालांकि यह मत ऐतिहासिक दृष्टि से तर्कसंगत नहीं माना जाता।
  • ‘शाह’ उपाधि की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न मत हैं और कोई एक मत सर्वमान्य नहीं है। इतना कहा जा सकता है कि बलभद्र शाह के बाद पंवार शासकों द्वारा ‘शाह’ उपाधि का क्रमागत प्रयोग स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
  • एक मत के अनुसार परमार शासकों को लोदी वंश के शासक बहलोल लोदी द्वारा ‘शाह’ की उपाधि प्रदान की गई थी।
  • बलभद्र शाह के समय गढ़वाल और मुगलों के बीच राजदूत भेजने की परंपरा प्रारंभ होने का उल्लेख मिलता है। इसी क्रम में गढ़वाल की ओर से अकबर के दरबार में राजदूत भेजे जाने की बात कही जाती है।
  • ग्वालदम का युद्ध बलभद्र शाह और कुमाऊँ के शासक रुद्रचंद के बीच हुआ था। वॉल्टन ने इसकी तिथि 1581 ई. बताई है, जबकि शिवप्रसाद डबराल ने 1591 ई. को युद्ध की तिथि माना है।
  • ग्वालदम वर्तमान में चमोली और बागेश्वर की सीमा के निकट स्थित है।
  • ग्वालदम के युद्ध में कत्यूरी राजा सुकालदेव ने बलभद्र शाह की सहायता की थी। इस युद्ध में रुद्रचंद के सेनापति पुरुषोत्तम पंत/पुरुष पंत की मृत्यु हुई।
  • परंपरा के अनुसार सेनापति की मृत्यु से दुखी होकर रुद्रचंद ने बाद में बैजनाथ के युद्ध में सुकालदेव को पराजित कर मार डाला।
  • ग्वालदम के युद्ध के बाद बलभद्र शाह द्वारा ‘बहादुर शाह’ की उपाधि धारण किए जाने का उल्लेख मिलता है।
  • एटकिंसन ने ग्वालदम के युद्ध के समय गढ़वाल के शासक का नाम दुलाराम साह बताया है।
  • कवि देवराज ने बलभद्र शाह की तुलना महाभारत के भीमसेन से की है, जो उनकी वीरता का संकेत माना जाता है।
  • रामायण प्रदीप के अनुसार बलभद्र शाह ने श्रीनगर में विशाल ‘चित्रशाला प्रासाद’ का निर्माण करवाया था।
  • बलभद्र शाह के संबंध में ढाँडरी शिलालेख भी महत्वपूर्ण है। इसमें उनके 1593 ई. तक जीवित होने की जानकारी मिलने का उल्लेख किया जाता है।
  • अकबरनामा में बलभद्र शाह का उल्लेख ‘रामशाह’ के नाम से किया गया है।
  • बलभद्र शाह के दो प्रमुख पुत्र बताए जाते हैं—मानशाह और महिपतिशाह।
  • बलभद्र शाह ने श्रीनगर में प्रस्तर से निर्मित विशाल चित्रशाला प्रासाद का निर्माण करवाया, जिसका उल्लेख रामायण प्रदीप में भी मिलता है।

निष्कर्ष

राजा बलभद्र शाह पंवार/परमार वंश के 43वें शासक के रूप में गढ़वाल के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनके शासनकाल में गढ़वाल के मुगल सत्ता के साथ राजनयिक संपर्क विकसित होने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। उनके समय का ग्वालदम युद्ध गढ़वाल और कुमाऊँ के संघर्षों की दृष्टि से महत्वपूर्ण था, जिसकी तिथि को लेकर वॉल्टन और शिवप्रसाद डबराल के मत अलग-अलग हैं। बलभद्र शाह के नाम से जुड़े रामशाह, दुलाराम शाह और बहादुर शाह जैसे विभिन्न रूप उनके ऐतिहासिक उल्लेखों की विविधता को दर्शाते हैं। ‘शाह’ उपाधि के प्रयोग को लेकर भी इतिहासकारों में मतभेद है, लेकिन बलभद्र शाह के बाद इसका नियमित प्रयोग स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। श्रीनगर में चित्रशाला प्रासाद का निर्माण तथा उनके संबंध में प्राप्त अभिलेख और साहित्यिक उल्लेख उनके शासनकाल के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक महत्व को दर्शाते हैं।

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