राजा सहजपाल (1547–1575 ई.)|Parmar/Panwar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

पंवार/परमार राजवंश के इतिहास में राजा सहजपाल का शासनकाल राजनीतिक, अभिलेखीय एवं सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्हें परमार वंश का 42वाँ शासक माना जाता है और उनका शासनकाल लगभग 1547 से 1575 ई. के मध्य माना जाता है। वे मुगल सम्राट अकबर के समकालीन थे और गढ़वाल के तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य में उनका महत्वपूर्ण स्थान था। सहजपाल के समय के देवप्रयाग स्थित रघुनाथ मंदिर के पाँच अभिलेख उनके शासनकाल के प्रमुख ऐतिहासिक प्रमाण हैं। इसके अतिरिक्त अकबर के साथ उनके समय में हुए संपर्क तथा शिवालिक क्षेत्र में मुगल मनसबदारों की गतिविधियाँ गढ़वाल की तत्कालीन राजनीतिक स्थिति पर प्रकाश डालती हैं।

प्रमुख तथ्य

  • सहजपाल को पंवार/परमार वंश का 42वाँ शासक माना जाता है।
  • सहजपाल का शासनकाल लगभग 1547 ई. से 1575 ई. के मध्य माना जाता है।
  • सहजपाल मुगल सम्राट अकबर के समकालीन थे। सहजपाल के साथ बलभद्र शाह और राजा मानसाह भी अकबर के समकालीन पंवार शासक माने जाते हैं।
  • सहजपाल के समय के कुल पाँच अभिलेख देवप्रयाग के रघुनाथ मंदिर से प्राप्त हुए हैं। इनमें सबसे प्राचीन अभिलेख 1548 ई. तथा सबसे अंतिम 1573 ई. का है।
  • देवप्रयाग स्थित रघुनाथ मंदिर की एक घंटी पर 1561 ई. का लेख मिलता है, जिसे सहजपाल द्वारा चढ़ाया गया माना जाता है।
  • सहजपाल कुमाऊँ के भीष्मचंद, बालो कल्याणचंद तथा रुद्रचंद के समकालीन थे।
  • सहजपाल के समय अकबर ने गंगा के स्रोत की खोज के लिए एक दल गढ़वाल भेजा था।
  • परंपरा के अनुसार सहजपाल के समय अकबर ने पांडुकेश्वर स्थित योगबद्री मंदिर में घंटा चढ़ाया था।
  • गढ़वाल राज्ञा वंशावली में सहजपाल की प्रशंसा करते हुए उन्हें “वीरः गुणज्ञः सुखदः प्रजायाः” कहा गया है।
  • मेधाकर शर्मा द्वारा रचित रामायण प्रदीप में सहजपाल को महाबली तथा विद्वानों का आश्रयदाता बताया गया है।
  • कवि भरत ने मनोदय काव्य में सहजपाल को राजनीति में चतुर तथा संग्राम में शत्रुओं को संताप देने वाला बताया है।
  • विभिन्न वंशावलियों में सहजपाल को अजयपाल का पाँचवाँ वंशज बताया गया है।
  • हालांकि मनोदय काव्य और रामायण प्रदीप में सहजपाल को अजयपाल का पुत्र बताया गया है। इस प्रकार उनके वंश-संबंध को लेकर स्रोतों में मतभेद दिखाई देता है।
  • सहजपाल के शासनकाल में मुगल सम्राट अकबर के मनसबदार तथा काँठ-गोला के जागीरदार हुसैन खाँ टुकड़िया ने शिवालिक पहाड़ियों में छापा मारकर लूटपाट करने का प्रयास किया।
  • हुसैन खाँ टुकड़िया का प्रमुख उद्देश्य बसंतपुर पर अधिकार करना था, जिसे दून क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण एवं समृद्ध नगर माना जाता था; किंतु उसका अभियान विशेष सफल नहीं हो सका।

निष्कर्ष

राजा सहजपाल पंवार/परमार वंश के 42वें शासक और 16वीं शताब्दी के महत्वपूर्ण गढ़वाली शासक थे। उनका शासनकाल लगभग 1547–1575 ई. माना जाता है और वे अकबर के समकालीन थे। उनके समय के देवप्रयाग रघुनाथ मंदिर के पाँच अभिलेख उनके शासनकाल के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रमाण हैं। साहित्यिक स्रोतों में गढ़वाल राज्ञा वंशावली, मनोदय काव्य और रामायण प्रदीप उनकी वीरता, राजनीतिक कुशलता तथा विद्वानों के संरक्षण की प्रशंसा करते हैं। उनके समय में अकबर के गंगा-स्रोत संबंधी अभियान तथा शिवालिक क्षेत्र में हुसैन खाँ टुकड़िया की गतिविधियाँ गढ़वाल और मुगल सत्ता के संपर्क को दर्शाती हैं। इस प्रकार सहजपाल का काल अभिलेखीय प्रमाणों, साहित्यिक उल्लेखों और मुगल-गढ़वाल संबंधों की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।

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