राजा लखणदेव/लषणदेव |Parmar/Panwar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
पंवार/परमार वंश के प्रारंभिक शासकों में राजा लखणदेव या लषणदेव का विशेष महत्व है। उन्हें परमार राजवंश का 28वाँ शासक माना जाता है। लषणदेव का महत्व मुख्यतः उनकी मुद्रा के कारण है, जो परमार वंश के प्रारंभिक इतिहास में महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक प्रमाण प्रस्तुत करती है। उनके नाम से जारी ताम्र मुद्रा से न केवल तत्कालीन मुद्रा-प्रचलन की जानकारी मिलती है, बल्कि उनके राजनीतिक अधिकार और स्वतंत्र सत्ता के संबंध में भी इतिहासकारों ने अनुमान लगाए हैं। उनकी सत्ता का संबंध भिलंगना घाटी से भी जोड़ा जाता है।
प्रमुख बिंदु
- लखणदेव/लषणदेव को पंवार/परमार राजवंश का 28वाँ राजा माना जाता है।
- लषणदेव को अपने नाम से मुद्रा चलाने वाला परमार वंश का पहला शासक माना जाता है।
- लषणदेव की मुद्रा ताम्र (तांबे) धातु से निर्मित थी।
- इस ताम्र मुद्रा के पुरोभाग (Obverse) पर नागरी लिपि में ‘लषनदेव’ स्पष्ट रूप से अंकित है।5.
- मुद्रा के पृष्ठभाग (Reverse) पर अंकित लेख स्पष्ट नहीं है।
- लषणदेव की मुद्रा का व्यास लगभग 1.5 सेंटीमीटर बताया जाता है।
- लषणदेव की मुद्राएँ वर्तमान में पुराना दरबार संग्रहालय, टिहरी में सुरक्षित बताई जाती हैं।
- लषणदेव द्वारा अपने नाम से मुद्रा जारी करना उनके स्वतंत्र राजनीतिक अधिकार का संकेत माना जाता है। इसी आधार पर कुछ इतिहासकार उन्हें ऐसा प्रारंभिक परमार शासक मानते हैं जिसने कार्तिकेयपुर राजवंश को कर देना बंद कर दिया था।
- इस आधार पर लषणदेव को परमार/पंवार सत्ता के प्रथम स्वतंत्र शासकों में से एक माना जाता है।
- लषणदेव ने अपनी राजधानी टिहरी क्षेत्र की भिलंगना घाटी में स्थापित की थी।
निष्कर्ष
राजा लखणदेव या लषणदेव पंवार/परमार वंश के इतिहास में मुख्यतः अपनी ताम्र मुद्रा के कारण महत्वपूर्ण हैं। उन्हें वंश का 28वाँ शासक माना जाता है तथा अपने नाम से मुद्रा जारी करने वाला पहला परमार शासक बताया जाता है। मुद्रा के पुरोभाग पर नागरी में ‘लषनदेव’ का स्पष्ट अंकन उनके नाम और सत्ता का महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक प्रमाण है। वर्तमान में उनकी मुद्राओं का संबंध पुराना दरबार संग्रहालय, टिहरी से बताया जाता है। अपने नाम से मुद्रा चलाने के आधार पर उनके स्वतंत्र राजनीतिक अस्तित्व का अनुमान लगाया जाता है तथा उन्हें कार्तिकेयपुर सत्ता से स्वतंत्र होने वाला प्रारंभिक परमार शासक माना जाता है। उनकी राजधानी का संबंध भिलंगना घाटी से जोड़ा जाता है। इस प्रकार लषणदेव की मुद्रा गढ़वाल के प्रारंभिक पंवार इतिहास के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत है।