राजा सोनपाल या सुवर्णपाल |Parmar/Panwar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

पंवार/परमार वंश के इतिहास में राजा सोनपाल या सुवर्णपाल का महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। उपलब्ध वंशावली परंपरा के अनुसार सोनपाल परमार वंश के 24वें शासक थे। उनके समय के बाद परमार राज्य के विभाजन की परंपरा मिलती है, जिसके अनुसार उनके पुत्रों ने राज्य को दो भागों में बाँट दिया। इनमें एक शाखा का केंद्र भिलंगना घाटी तथा दूसरी का केंद्र चाँदपुरगढ़ बताया जाता है। भिलंगना घाटी की शाखा के शासक सोमवंशी कहलाए। सोनपाल के नाम को लेकर भी स्रोतों में सोनपाल, सुवर्णपाल और स्वर्णपाल जैसे रूप मिलते हैं, जिसके कारण उनके संबंध में संस्थापक होने का एक मत भी विकसित हुआ।

प्रमुख बिंदु

  • सोनपाल या सुवर्णपाल को पंवार/परमार वंश का 24वाँ राजा माना जाता है।
  • विद्वानों के अनुसार सोनपाल के बाद उनके पुत्रों ने राज्य को दो भागों में विभाजित कर दिया।
  • राज्य के एक भाग की राजधानी भिलंगना घाटी तथा दूसरे भाग की राजधानी चाँदपुरगढ़ बताई जाती है।
  • भिलंगना घाटी की शाखा के शासक सोमवंशी राजा कहलाए।
  • सोनपाल के नाम को लेकर स्रोतों में भिन्न रूप मिलते हैं। विलियम्स ने सोनपाल को ‘सुवर्णपाल’ तथा कवि देवराज ने ‘स्वर्णपाल’ के रूप में लिखा है।
  • दूसरी ओर, कवि देवराज ने कनकपाल को भी ‘स्वर्णपाल’ कहा है। इस प्रकार कनकपाल और सोनपाल के नामों में समानता दिखाई देती है।
  • कनकपाल और सोनपाल के लिए स्वर्णपाल/सुवर्णपाल जैसे नामों के प्रयोग के कारण कुछ विद्वानों ने भिलंगना घाटी के सोनपाल को ही पंवार/परमार वंश का संस्थापक मानने का प्रयास किया।

निष्कर्ष

राजा सोनपाल या सुवर्णपाल को परंपरागत रूप से पंवार/परमार वंश का 24वाँ शासक माना जाता है। उनके बाद राज्य के दो भागों में विभाजन की परंपरा गढ़वाल के राजनीतिक इतिहास में महत्वपूर्ण मानी जाती है। एक शाखा का संबंध भिलंगना घाटी और दूसरी का चाँदपुरगढ़ से जोड़ा जाता है तथा भिलंगना शाखा के शासकों को सोमवंशी कहा गया। सोनपाल के नाम के विभिन्न रूप—सोनपाल, सुवर्णपाल और स्वर्णपाल—तथा कनकपाल के लिए भी ‘स्वर्णपाल’ नाम के प्रयोग ने उनके संबंध में ऐतिहासिक भ्रम उत्पन्न किया। इसी नाम-साम्य के आधार पर कुछ विद्वानों ने सोनपाल को परमार वंश का संस्थापक माना, जबकि कनकपाल को संस्थापक मानने वाला मत अधिक प्रचलित एवं स्वीकार्य है।

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