उद्योत चंद भाग -2
- वे उदार दानदाता भी थे। उन्होंने ब्राह्मणों को गृहदान तथा अनेक मंदिरों को जागीरें प्रदान कीं।
- उद्योत चंद से संबंधित कई ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं। इनमें 1679 ई. का बरम (मुवानी, पिथौरागढ़) ताम्रपत्र महत्वपूर्ण है। इसमें उनकी धाईमाता की बीमारी का उल्लेख मिलता है तथा राजवैद्य वरदेव जोशी को भूमि दिए जाने की जानकारी मिलती है।
- उद्योत चंद ने तल्ला महल और रंगमहल का निर्माण कराया।
- उनके समय माल का सीकदार जगन्नाथ बरै तथा सीरा का सीकदार गंगाराम था। उस समय सीरा को ‘वल्ली डोटी’ भी कहा जाता था।
- उद्योत चंद ने अपने महल में दशैं का छाजा अथवा दशहरा भवन बनवाया था।
- उन्होंने बरारौ में सोमेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण कराया।
- उद्योत चंद के समय लालमंडी किले में ऋद्धिगिरि गुसाईं बाबा रहते थे। उनके और राजा के बीच अच्छे संबंध थे। ऋद्धिगिरि गुसाईं राजा को प्रेमपूर्वक ‘उदुवा’ कहकर पुकारते थे।
- उद्योत चंद ने एक लाख दीपक जलाकर देवता की पूजा की थी। इस धार्मिक आयोजन को ‘लक्ष दीपावली’ कहा गया।
- उद्योत चंद को इतिहासकार रुद्रदत्त पंत ने ‘तपस्वी शासक’ कहा है, क्योंकि जीवन के अंतिम चरण में उन्होंने युद्ध और सत्ता-संघर्ष से विरक्त होकर शांति, धर्म तथा विद्या की ओर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया था।
निष्कर्ष
राजा उद्योत चंद का शासन चंद वंश के इतिहास में दो अलग-अलग चरणों को प्रस्तुत करता है—पहला सैन्य विस्तार और संघर्ष का चरण तथा दूसरा धर्म, विद्या और शांति का चरण। अपने शासन के प्रारंभ में उन्होंने पंवार राज्य और डोटी के विरुद्ध लगातार अभियान चलाए तथा बधाणगढ़, चांदपुरगढ़ी और अजमेरगढ़ जैसे क्षेत्रों में अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया। 1688 ई. की खैरागढ़ संधि उनकी डोटी नीति की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। हालांकि 1696 ई. के बाद डोटी के साथ संघर्ष में मिली पराजय ने उनके दृष्टिकोण में परिवर्तन ला दिया। इसके बाद उन्होंने युद्ध से विरक्ति लेकर मंदिरों, नौलों, महलों और आम्र-वाटिकाओं का निर्माण, ब्राह्मणों को दान तथा विद्वानों का संरक्षण किया। ‘लक्ष दीपावली’, ताम्रपत्र, मंदिर निर्माण और ‘तपस्वी शासक’ की उपाधि उनके शासन के धार्मिक एवं सांस्कृतिक पक्ष को विशेष रूप से महत्वपूर्ण बनाते हैं।