राजा त्रिमल चंद |Chand Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
राजा त्रिमल चंद चंद वंश के इतिहास में एक महत्वपूर्ण शासक थे, जिनका जीवन उत्तराधिकार संघर्ष, दरबारी षड्यंत्रों के दमन तथा गढ़वाल से संघर्ष जैसी घटनाओं से जुड़ा रहा। विजयचंद की हत्या के बाद चंद राज्य में उत्पन्न महरा–फर्त्याल संघर्ष में महरा दल ने गढ़वाल के राजा श्यामशाह की सहायता से त्रिमलचंद को शासक बनाया। सत्ता संभालने के बाद त्रिमलचंद ने विजयचंद की हत्या में शामिल प्रमुख षड्यंत्रकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की और राजदरबार तथा रसोई व्यवस्था में परिवर्तन किए। वे केवल राजा के रूप में ही नहीं, बल्कि युवराज रहते हुए भी सक्रिय प्रशासक और सैन्य नेतृत्वकर्ता रहे। गड़यूड़ा ताम्रपत्र में उन्हें ‘महाराज कुमार’ कहा गया है।
प्रमुख बिंदु
- विजयचंद की हत्या के बाद चंद राज्य में महरा और फर्त्याल दलों के बीच संघर्ष हुआ। इस संघर्ष में महरा दल की विजय हुई और गढ़वाल के राजा श्यामशाह की सहायता से त्रिमलचंद को शासक बनाया गया।
- राजा बनने के बाद त्रिमलचंद ने विजयचंद की हत्या से जुड़े षड्यंत्रकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की। उन्होंने सुखराम कार्की को मरवा दिया, विनायक भट्ट की आँखें निकलवा दीं तथा पीरू गुसाईं को देश निकाला दे दिया।
- विजयचंद की हत्या में रसोइयों और राजचेलियों की भूमिका भी बताई जाती है। इसलिए त्रिमलचंद ने उन्हें भी बदलकर अपने विश्वासपात्र व्यक्तियों को नियुक्त किया।
- त्रिमलचंद ने राजमहल की रसोई व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए नए नियम बनाए। इससे राजदरबार की आंतरिक व्यवस्था पर उनका नियंत्रण मजबूत हुआ।
- नीलू कठायत के खानदान के कर्ण कठायत को रसोई दरोगा नियुक्त किया गया।
- त्रिमलचंद ने अपने शासनकाल में छखाता और ध्यानीरौ के खसों के विद्रोह को दबाया और राज्य की आंतरिक स्थिति को नियंत्रित किया।
- त्रिमलचंद का गढ़वाल के राजा महीपतिशाह के साथ युद्ध हुआ। इस युद्ध में महीपतिशाह की मृत्यु हो गई
- गड़यूड़ा ताम्रपत्र में त्रिमलचंद के लिए ‘महाराज कुमार’ की उपाधि का उल्लेख मिलता है। यहाँ ‘महाराज कुमार’ का अर्थ युवराज से है।
- त्रिमलचंद ने युवराज रहते हुए लगभग पाँच वर्षों तक अपने वृद्ध पिता की ओर से राजशासन चलाया था। इससे स्पष्ट होता है कि उन्हें शासन और प्रशासन का पर्याप्त अनुभव अपने पिता के जीवनकाल में ही प्राप्त हो गया था।
- युवराज के रूप में त्रिमलचंद ने अपने पिता के गढ़वाल अभियानों में सक्रिय सहायता की थी। इस प्रकार उनके राजनीतिक और सैन्य अनुभव का विकास राजगद्दी पर बैठने से पहले ही हो चुका था।
- त्रिमलचंद का धार्मिक एवं सांस्कृतिक पक्ष भी उल्लेखनीय था। उन्होंने जागेश्वर में मंदिरों का निर्माण करवाया।
निष्कर्ष
राजा त्रिमल चंद का शासन चंद वंश के इतिहास में राजनीतिक संघर्ष और सत्ता के पुनर्गठन का महत्वपूर्ण चरण था। विजयचंद की हत्या के बाद जिस दरबारी षड्यंत्र और उत्तराधिकार संकट ने चंद राज्य को प्रभावित किया था, त्रिमलचंद ने सत्ता में आते ही उसके विरुद्ध कठोर कदम उठाए। सुखराम कार्की को दंड, विनायक भट्ट को अंधा करवाना और पीरू गुसाईं को निर्वासित करना उनकी कठोर राजनीतिक नीति को दर्शाता है। उन्होंने राजमहल की रसोई व्यवस्था में भी परिवर्तन किए और विद्रोही खस समूहों का दमन किया। दूसरी ओर, महीपतिशाह के साथ युद्ध उनके सैन्य जीवन की महत्वपूर्ण घटना थी। गड़यूड़ा ताम्रपत्र में ‘महाराज कुमार’ के रूप में उनका उल्लेख तथा युवराज रहते हुए पाँच वर्षों तक शासन संचालन उनकी प्रशासनिक क्षमता को दर्शाता है। साथ ही जागेश्वर में मंदिर निर्माण उनके धार्मिक संरक्षण को स्पष्ट करता है।