पंवार राज्य की भू-व्यवस्था

परिचय

पंवार राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि और उससे प्राप्त भू-राजस्व का प्रमुख स्थान था। भूमि को राज्य की सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति माना जाता था और राजा को सम्पूर्ण भूमि का स्वामी समझा जाता था। राजा विशेष परिस्थितियों में भूमि को रौत, जागीर तथा संकल्प (विष्णु प्रीति) के रूप में प्रदान कर सकता था। भूमि व्यवस्था में थात, थातवान, खायकर, सिरतान और कैनी जैसे शब्द महत्वपूर्ण थे। भू-राजस्व की वसूली के लिए थोकदार, प्रधान तथा बूढ़ा जैसे अधिकारी नियुक्त थे और राज्य की भूमि तथा राजस्व से संबंधित अभिलेख राजधानी के दफ्तरी कार्यालय में सुरक्षित रखे जाते थे।

पंवार राज्य की भू-व्यवस्था

  • पंवार राज्य की आय का मुख्य स्रोत कृषि से प्राप्त भू-राजस्व था।
  • पंवार राज्य में राजा को सम्पूर्ण भूमि का स्वामी माना जाता था।
  • राजा तीन प्रमुख परिस्थितियों में भूमि का स्वामित्व अथवा अधिकार दूसरों को प्रदान कर सकता था—रौतजागीरसंकल्प (विष्णु प्रीति)
  • रौत — युद्ध में विशेष वीरता एवं साहस दिखाने वाले सैनिकों को पुरस्कारस्वरूप दी जाने वाली भूमि को रौत कहा जाता था।
  • संकल्प (विष्णु प्रीति) — संकल्प के माध्यम से भूमि का स्थायी दान मुख्यतः मंदिरों, ब्राह्मणों एवं विद्वानों को दिया जाता था।
  • जागीर — राज्य के अधिकारियों को प्रदान की जाने वाली भूमि को जागीर कहा जाता था।
  • सामान्यतः रौत एवं जागीर अस्थायी भूमि-अनुदान होते थे। राजा आवश्यकता पड़ने पर इन्हें वापस ले सकता था, जबकि संकल्प द्वारा दिया गया भूमि-दान स्थायी माना जाता था।
  • जिस व्यक्ति अथवा मंदिर को संकल्प, रौत या जागीर के माध्यम से कोई थात (भूमि) प्रदान की जाती थी, उसे थातवान कहा जाता था।
  • थातवान को अपनी थात में पहले से बसे कृषकों को बेदखल करने का अधिकार नहीं था।
  • थातवान की भूमि पर बसे कृषक ‘खायकर’ कहलाते थे। जब तक खायकर थातवान को निर्धारित राजस्व देता रहता था, उसे उस थात से हटाया नहीं जा सकता था।
  • भूमि अनेक थातों में विभाजित थी और प्रत्येक थात किसी थातवान के अधीन होती थी। थातवान की भूमिका एक प्रकार के जमींदार जैसी थी।
  • थातवान का प्रमुख कार्य अपनी थात से भू-राजस्व एकत्रित करके राजकोष में जमा करना था।
  • थातवान स्वयं भी भूमि पर कृषि कर सकता था तथा खायकरों एवं सिरतान से भी कृषि करवाता था। इनसे थातवान को राजस्व प्राप्त होता था।
  • खायकर स्थायी कृषक माने जाते थे, जबकि सिरतान अस्थायी कृषक होते थे।
  • सिरतान एवं खायकरों से भू-कर के अतिरिक्त समय-समय पर भेंट, दस्तूर तथा मिठाई के रूप में भी देय लिया जाता था।
  • थातवान थात का स्वामी होने के बावजूद अपनी थात में पहले से बसे लोगों को मनमाने ढंग से बेदखल नहीं कर सकता था।
  • थातवान अपनी थात की जिस भूमि पर स्वयं खेती करता था, वहाँ वह नए परिवारों को बसा सकता था। ऐसे परिवारों को ‘कैनी’ कहा जाता था।
  • कभी-कभी थातवान अपनी भूमि पर कृषकों को अपनी इच्छा के अनुसार अस्थायी रूप से बसाता था और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें हटा सकता था। ऐसे कृषक ‘सिरतान’ कहलाते थे।
  • राजधानी में दफ्तरी के कार्यालय में पूरे राज्य की कृषि भूमि का लेखा-जोखा रखा जाता था। भूमि की आय तथा उसमें बोए जाने वाले बीज के आधार पर विवरण नालियों में दर्ज किया जाता था।
  • राज्य की आय का प्रमुख साधन सिरती अथवा भू-कर था।
  • भू-राजस्व की दर भूमि की उर्वरता के अनुसार अलग-अलग थी। सामान्यतः यह उपज के 1/3 से 1/2 भाग तक होती थी।
  • सामान्य भूमि से लगभग 1/3 उपज तथा अधिक उपजाऊ भूमि से लगभग 1/2 उपज भू-राजस्व के रूप में ली जाती थी।
  • भूमि की नाप की प्रमुख इकाई ‘नाली’ थी।
  • भू-राजस्व की वसूली में थोकदार, प्रधान तथा बूढ़ा जैसे अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
  • थोकदार परगनों से भू-राजस्व एकत्रित करते थे।
  • प्रधान गाँवों से भू-राजस्व की वसूली करते थे।
  • बूढ़ा भी भू-राजस्व वसूली से संबंधित अधिकारी था। उपलब्ध विवरणों में थोकदार को सियाणा/ग्राम स्तर के अधिकारी के रूप में भी संदर्भित किया गया है।
  • संपूर्ण राज्य के भू-राजस्व संबंधी दस्तावेज एवं आँकड़े राजधानी में स्थित दफ्तरी कार्यालय में सुरक्षित रखे जाते थे।

निष्कर्ष

पंवार राज्य की भू-व्यवस्था राजा के सर्वोच्च भूमि-अधिकार और स्थानीय भू-प्रबंधन पर आधारित थी। रौत, जागीर और संकल्प के माध्यम से भूमि के विभिन्न प्रकार के अनुदान दिए जाते थे। थातवान भूमि-व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी था, जबकि खायकर एवं सिरतान कृषि उत्पादन से जुड़े प्रमुख कृषक वर्ग थे। भू-राजस्व की वसूली के लिए थोकदार, प्रधान और बूढ़ा जैसे अधिकारियों की व्यवस्था थी तथा भूमि एवं राजस्व का केंद्रीय लेखा दफ्तरी कार्यालय में रखा जाता था। भूमि की नाप के लिए नाली का प्रयोग और उपज के आधार पर 1/3 से 1/2 तक भू-राजस्व की वसूली पंवारकालीन भू-राजस्व व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ थीं।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *