महापाषानीय शवाधान (Megalithic Burials)|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material
परिचय
उत्तराखंड के आद्य ऐतिहासिक काल को समझने में महापाषाणीय शवाधान महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक साक्ष्य हैं। इनसे तत्कालीन मानव की मृत्यु, परलोक तथा सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। शवों के साथ विभिन्न प्रकार के मृद्भाण्ड, धातु उपकरण, अस्त्र-शस्त्र तथा अन्य वस्तुओं का रखा जाना इस बात का संकेत देता है कि मृतक के साथ उपयोगी वस्तुएँ रखने की परंपरा प्रचलित थी। उत्तराखंड में चमोली की नीति घाटी स्थित मलारी तथा अल्मोड़ा की पश्चिमी रामगंगा घाटी के सानणा-बसेड़ी आदि स्थलों से प्राप्त शवाधान इस परंपरा की व्यापकता को स्पष्ट करते हैं। इन पुरातात्त्विक अवशेषों के माध्यम से उत्तराखंड के तत्कालीन समाज की जीवन-पद्धति, तकनीकी ज्ञान, आर्थिक गतिविधियों और बाहरी सांस्कृतिक संपर्कों को समझने में सहायता मिलती है।
महापाषाणीय शवाधान प्रमुख तथ्य व विशेषताये
- शिवप्रसाद डबराल नें 1956 में नीति घाटी के मलारी गांव, चमोली से महापाषाणीय शवाधानों की खोज की।
- इन शवाधानों की आकृति मण्डलाकार गर्तों जैसी है जिनमें शव के चारों ओर अनगढ़ शिलाएँ खड़ी करके रखी गई हैं एवं इन्हें ऊपर से बड़े-बड़े पटालों से ढका गया है।
- इन शवाधानों में मानव अवशेषों के साथ अश्व, मेढ़, तस्तरिया, विभिन्न आकार की टोंटी एवं हत्थेयुक्त कुडुप इत्यादि भी रखे गए हैं। सम्भवतः ये इस बात का संकेत है कि इस काल का मनुष्य मृत्यु के बाद भी जीवन की कल्पना करता है।
- मलारी गांव से काले धूसर रंग मृदभाड और हत्थे युक्त कुतुप पर बना मोनाल का चित्र मिला जिसे आगरा भेजा गया था।
- डबराल जी ने मलारी के शवाधानों को लिम्पा के शवाधानों की समान बताया।लिम्पा के शवाधानों की खोज 1948 में राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिम्पा,किन्नौर, हिमाचल प्रदेश में की गई।
- इन शवाधानों की मुख्य विशेषता है कि शवों को सीधा नहीं अपितु औंधा लिटाकर रखा गया है।
- धृषमैन महोदय के अनुसार लगभग 2000 ई०पू० ऐसी शवाधान पद्धति ईरान, अफगानिस्तान एवं मध्य एशिया में प्रचलित थी।
- इतिहासकारों ने इन शवाधानों को पशुचारक जाति से जोड़ा है।
- गढ़वाल विश्वविद्यालय द्वारा 1983 वह 2001 में मलारी गांव का सर्वेक्षण किया गया |
- 1983 का सर्वेक्षण बी एम खंडूरी के नेतृत्व में किया गया।अपने सर्वेक्षण में उन्हें आखेट के लिए प्रयुक्त लौह उपकरणों के साथ एक पशु का पूर्ण कंकाल मिला है जिसकी पहचान हिमालयी पशु वृषभ जुबू (जोबा )के रूप में की गई है।
- 2001 के गढ़वाल विश्वविद्यालय के सर्वेक्षण में संपूर्ण मानव कंकाल के साथ 5.2 किलो का स्वर्ण मुखौटा, मिट्टी के बर्तन के साथ काँसे का कटोरा (Bowl) सर्वेक्षण की मुख्य उपलब्धि है। इन सर्वेक्षणों में लोहित एवं कृष्ण ओपदार पात्र, लौह बाणाग्र तथा छुरियाँ (Knife) इत्यादि भी प्रकाश में आए हैं।
- सम्भवतः मलारी के शवाधानों का निर्माण एक पहाड़ी को काटकर गुफा रूप में किया गया था।
- राहुल सांकृत्यायन ने इन्हें खस जाति की समाधियाँ माना है(जो साक्ष्य के आधार पर सबसे अधिक प्रमाणित हैं )जबकि एच०डी० सांकलिया महोदय ने इन्हें आर्यों से सम्बन्धित किया है।
- इन शवाधानों की तुलना अ• दानी नें पाकिस्तान स्वात -घाटी की गांधार-शावगार संस्कृति से तथा टूसी ने इस घाटी के दरद समुदाय से संबंधित बताया है।
- घनश्याम जोशी के अनुसार उत्तराखंड में सर्वाधिक प्राचीन लोह फलक मलारी ग्राम के महापाषाण कालीन शवाधानों से प्राप्त हुए हैं।
- यशोधर मठपाल महोदय को अल्मोड़ा जिले की पश्चिमी रामगंगा घाटी के नौला–जैनल गाँव से भी शवाधान मिले।
- गढ़वाल विश्वविद्यालय को पश्चिमी रामगंगा घाटी के सानणा एवं बसेड़ी ग्रामों से दो प्रकार के शवाधान प्राप्त हुए, प्रथम प्रस्तर पेटिका शवाधान (Schist Burial) एवं द्वितीय घट–शवाधान (Urn-Burial)। सानणा से प्राप्त नौ शिस्ट वरिअल को चौकोर प्रस्तर पट्टिकाओं से ढका गया है। शव रखने के किसी निश्चित विधान का पालन नहीं है एवं शिस्ट कक्ष को चारों ओर से सुरक्षा भित्ती से घेरा गया है। बसेड़ी में शिस्ट एवं अर्न वरिअल दोनों मिले हैं। इन अर्न वरिअल में हस्तनिर्मित घट के साथ मानव अस्थियों के साथ लौह उपकरण प्राप्त हुए हैं। इन घटों पर पटाई जैसी छाप बनी है। इन दोनों स्थलों से प्राप्त शिस्ट–कक्षों की योजना आयताकार है जिन्हें लगभग खड़ी तीन से छः शिलाओं से निर्मित किया गया है।
- सिस्ट (Cist) से तात्पर्य ऐसी प्रस्तर संरचना से है, जिसका उपयोग मकबरे/समाधि के रूप में किया जाता था। इसमें बड़े-बड़े एकाश्म (एक ही पत्थर से बने) प्रस्तर-खंडों का प्रयोग किया जाता था।
- सानणा–बसेड़ी से प्राप्त मिट्टी के पात्र चित्रित धूसर मृद्भाण्डों (PWG) से मिलते-जुलते हैं। इन शवाधानों से क्रमशः तस्तरियाँ, कटोरे, घट, चषक, पिन, कील एवं छत्र इत्यादि उपकरण भी प्राप्त हुए हैं। सम्भवतः ये शवाधान दूसरी सहस्राब्दी ई०पू० के आस-पास के हैं।
- इसके अतिरिक्त अल्मोड़ा के निकट दीनापानी से प्राप्त एकाश्म शिला का सम्बन्ध भी विद्वानों ने महापाषाणीय संस्कृति से बताया है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड में प्राप्त महापाषाणीय शवाधान केवल मृतकों को दफनाने की प्राचीन पद्धति के प्रमाण नहीं हैं, बल्कि वे तत्कालीन समाज की धार्मिक धारणाओं, सामाजिक संरचना और भौतिक संस्कृति को समझने के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। मलारी, सानणा, बसेड़ी, नौला-जैनल तथा दीनापानी जैसे स्थलों से प्राप्त साक्ष्य बताते हैं कि उत्तराखंड की पर्वतीय सभ्यता का विकास व्यापक सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से जुड़ा हुआ था। शवाधानों से प्राप्त धातु उपकरण, मृद्भाण्ड, मानव एवं पशु अवशेष तथा अन्य सामग्री तत्कालीन तकनीकी दक्षता और जीवन-पद्धति पर प्रकाश डालती है। विभिन्न विद्वानों द्वारा इन शवाधानों को खस, आर्य, पशुचारक समुदायों तथा गांधार-शावगार संस्कृति से जोड़ने के प्रयास इनके व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ को दर्शाते हैं। अतः महापाषाणीय शवाधान उत्तराखंड के आद्य ऐतिहासिक अतीत को पुनर्निर्मित करने का एक महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक आधार हैं।