. देव-वास्तु (Temple
9. वास्तुकला (Architecture)1Architecture)- पंवारकालीन समस्त वास्तु-कृतियाँ दो प्रधान प्रकार की थीं—देव-वास्तु तथा जन-वास्तु।- इनमें से देव-वास्तु अथवा धार्मिक वास्तु से आशय देवालय-वास्तुकला से है।- पंवारकालीन देवालय-वास्तुकला को कालक्रम की दृष्टि से दो कालखण्डों में विभाजित किया जा सकता है।(1) 1050 से 1550 ई. के मध्य की देवालय-वास्तु- इस काल की देवालय-वास्तु में कुछ सीमा तक कार्तिकेयपुरीय वास्तुकला की विशेषताओं को ग्रहण कर उसका विकसित रूप दिखाई देता है।- इस कालखण्ड की देवालय-वास्तुकला पर स्वर्णकाल की छाप होते हुए भी इसमें पूर्वकालीन सुगढ़ सौन्दर्य का पूर्ण अभाव है।- अभिप्रायों (Motifs) के उत्कीर्णन में भी वह स्पष्टता एवं गहराई नहीं मिलती।- केदारनाथ, रघुनाथ मन्दिर, देवप्रयाग, गौरीमन्दिर, देवलगढ़ आदि इस काल की वास्तु-रचनाएँ हैं।(2) 1550 से 1800 ई. के मध्य की देवालय-वास्तुइस काल की देवालय-वास्तु क्रमशः ह्रासोन्मुख होती चली गई।- वास्तुशास्त्रीय नियमों के निर्वाह में शिथिलता आने के फलस्वरूप वास्तु-रचनाएँ सौन्दर्य-विहीन हो गईं।- उदाहरण के लिए, देवालयों के अग्रभाग में ‘कपिलि ’ तो पूर्ववत् निर्मित किए गए, परन्तु उनमें चैत्यगवाक्ष तथा गजसिंह का महत्त्व शिल्पी भूल गया।- ‘शिखर’ अधिक लम्बोत्तर बन गये।- श्रीनगर का केशवरायमठ आदि मन्दिर, बाड़ाहाट का विश्वनाथ मन्दिर, मालीदेवल का लक्ष्मीनारायण मन्दिर (अब जलमग्न), गोपेश्वर के समीप अनसूयामाता मन्दिर, कर्णप्रयाग का उमा मन्दिर, ओकारेश्वर मन्दिर, ऊषीमठ आदि इस ह्रासकाल के उदाहरण हैं।- इस कालखण्ड में प्राचीन देवालयों के जीर्णोद्धार-कर्म में सक्रियता रही, परन्तु उनका पूर्वकालीन सौन्दर्य लौटाया नहीं जा सका।आलोच्यकालीन शैलियाँ- आलोच्यकालीन के देवालयों में भी विभिन्न शैलियाँ (Styles) मिलती हैं।- यमुना-घाटी में ‘यामुन-शैली’ के नव काष्ठ-मन्दिर अब भी बनते रहे तथा प्राचीनों का जीर्णोद्धार होता रहा।- गढ़देश के शेष भाग में ‘छत्र-रेखा-शिखर’ तथा ‘रुचक-रेखा-शिखर’ शैलियों के प्रस्तर देवालय विशेष रूप से निर्मित हुए।- परिवार-मन्दिरों के रूप में कहीं-कहीं ‘फाँसणा-शैली’ के देवालय भी देखे जाते हैं।- देवालय-रचना के लिए इष्टका (ईंट) का प्रयोग पैंवार-काल में नहीं मिलता।