कुमाऊँ के चंदों का न्याय प्रशासन
परिचय
कुमाऊँ के चंद शासकों की न्याय व्यवस्था प्राचीन भारतीय राजतंत्रीय परंपराओं के अनुरूप विकसित हुई थी। इस व्यवस्था में राजा न्याय का सर्वोच्च अधिकारी एवं प्रधान न्यायाधीश माना जाता था। उसके अधीन विभिन्न स्तरों पर स्थानीय कचहरियाँ एवं न्यायालय कार्य करते थे। अपराध की प्रकृति के अनुसार दंड निर्धारित किए जाते थे तथा गंभीर अपराधों के लिए मृत्युदंड तक का प्रावधान था। स्थानीय स्तर पर पंचों एवं विभिन्न अधिकारियों की भी न्यायिक भूमिका थी। इस प्रकार चंदकालीन न्याय प्रशासन में राजकीय न्याय, स्थानीय न्याय व्यवस्था तथा दंड व्यवस्था का समन्वय दिखाई देता है।
प्रमुख बिंदु
- प्राचीन भारतीय राजतंत्र की परंपरा के अनुरूप चंदकाल में राजा ही सर्वोच्च न्यायाधीश होता था।
- राजा देशद्रोही, राजविरोधी अथवा उपद्रवी व्यक्तियों को मृत्युदंड अर्थात् फाँसी की सजा सुना सकता था।
- फाँसी संभवतः ऊँचे पहाड़ी स्थानों पर दी जाती थी, जिसके लिए ‘शूली का डांडा’ शब्द का प्रयोग मिलता है।
- निम्न स्तर पर ‘न्यौवली’ तथा ‘बिष्टाली’ नामक कचहरियाँ होती थीं, जहाँ स्थानीय न्यायिक मामलों का निपटारा किया जाता था।
- ‘पंच नवीसी’ नामक न्यायालय भी होते थे, जिन्हें ‘चारथान’ कहा जाता था।
- दंड देने वाले अधिकारी को ‘डडै’ कहा जाता था। इस शब्द की व्युत्पत्ति ‘डाण’ शब्द से मानी जाती है।
- विजयचंद के पाभै ताम्रपत्र में कर्ण बिष्ट को ‘डडै’ कहा गया है।
- चंदकाल में अपराधियों को रखने के लिए कारागारों की भी व्यवस्था थी।
- सीराकोट उस काल का एक कुख्यात कारागार माना जाता था।
- इस प्रकार चंदकालीन न्याय व्यवस्था में राजा के साथ-साथ विभिन्न स्थानीय न्यायिक संस्थाओं एवं अधिकारियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
निष्कर्ष
कुमाऊँ के चंदों की न्याय व्यवस्था में राजा सर्वोच्च न्यायाधीश था और उसे गंभीर अपराधों में मृत्युदंड देने का अधिकार प्राप्त था। इसके अतिरिक्त न्यौवली, बिष्टाली तथा पंच नवीसी अथवा चारथान जैसी स्थानीय न्यायिक संस्थाएँ भी कार्य करती थीं। दंड देने वाले अधिकारी को डडै कहा जाता था, जिसका उल्लेख विजयचंद के पाभै ताम्रपत्र में मिलता है। वहीं सीराकोट जैसे कारागार दंड व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग थे। इस प्रकार चंदकालीन न्याय प्रशासन में राजकीय न्याय, स्थानीय कचहरियों, पंच-आधारित न्याय तथा दंड व्यवस्था का समन्वित स्वरूप दिखाई देता है।