श्याम शाह (1611–1631 ई.) भाग -1 |Parmar/Panwar Dynasty|Uttarakhand History In Hindi | Uttarakhand GK | Ukpsc/Uksssc Notes/Study Material

परिचय

राजा श्याम शाह (1611–1631 ई.) पंवार/परमार वंश का 45वाँ शासक था। वह राजा मानशाह का पुत्र और उत्तराधिकारी था। उसके शासनकाल में गढ़वाल राज्य का तिब्बत के साथ संघर्ष, मुगल दरबार से संपर्क तथा यूरोपीय जेसुइट पादरियों के आगमन जैसी महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं। श्याम शाह के संबंध में जानकारी मौलाराम के ‘गढ़ राजवंश काव्य’, ‘जहाँगीरनामा’ तथा जेसुइट पादरियों के यात्रा-विवरणों से प्राप्त होती है। उसके व्यक्तित्व के संबंध में इतिहासकारों ने उसे स्वेच्छाचारी, घमंडी तथा विलासी शासक के रूप में चित्रित किया है। उसके समय की घटनाएँ गढ़वाल के तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक जीवन को समझने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।

परिचय

  • श्याम शाह, राजा मानशाह का पुत्र था। मानशाह की मृत्यु के बाद लगभग 1611 ई. में उसने पंवार वंश की गद्दी संभाली और 1631 ई. तक शासन किया।
  • श्याम शाह को पंवार/परमार वंश का 45वाँ राजा माना जाता है।
  • श्याम शाह के संबंध में प्रमुख जानकारी मौलाराम की ‘गढ़ राजवंश काव्य’, ‘जहाँगीरनामा’ तथा गढ़वाल की यात्रा करने वाले जेसुइट पादरियों के यात्रा-विवरणों से प्राप्त होती है।
  • उसके समकालीन चंद शासकों में लक्ष्मीचंद, दिलीपचंद, विजयचंद तथा त्रिमलचंद का उल्लेख मिलता है।
  • इस समय चंद राज्य की राजनीतिक स्थिति कमजोर थी और चंद शासक अपने उत्तराधिकारी सुखराम/शकराम कार्की, पीरू गुसाईं तथा विनायक भट्ट जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों के प्रभाव में था। इसके कारण चंद और पंवार राज्यों के बीच अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण संबंध बने रहे।
  • चंद राज्य में षड्यंत्रों और अराजक राजनीतिक परिस्थितियों के कारण लक्ष्मीचंद के पुत्र त्रिमलचंद को पंवार राज्य में शरण लेनी पड़ी। बाद में त्रिमलचंद 1625–1638 ई. तक चंद राजा रहा और उसके समय दोनों राज्यों के बीच मधुर संबंध बने रहे।
  • मानशाह के समय दापा क्षेत्र के तिब्बती लुटेरों का पंवार सेना द्वारा दमन किया गया था। लेकिन मानशाह की मृत्यु के बाद उन्होंने पुनः लूटमार शुरू कर दी। इसके परिणामस्वरूप श्याम शाह ने तिब्बत पर आक्रमण किया।
  • इस अभियान में दापा के राजा को पराजित कर उससे एक सेर स्वर्ण चूर्ण, एक चार-सींग वाला मेढ़ा तथा एक चंवर गाय कर के रूप में देने के लिए बाध्य किया गया।
  • तिब्बत विजय के बाद श्याम शाह द्वारा वहाँ के एक महल तथा एक गाँव को जलाए जाने का उल्लेख मिलता है।
  • कुछ समय बाद तिब्बत में पुनः विद्रोह हुआ, जिसके कारण श्याम शाह ने दूसरी बार तिब्बत पर आक्रमण किया। इस बार उसे सफलता नहीं मिली और उसे तिब्बत के राजा से संधि करनी पड़ी।
  • तिब्बत अभियानों के कारण श्याम शाह की सैन्य गतिविधियाँ उसके शासनकाल की प्रमुख विशेषताओं में शामिल थीं। इतिहासकारों ने उसके व्यक्तित्व को स्वेच्छाचारी और घमंडी शासक के रूप में चित्रित किया है।
  • श्याम शाह का मुगल बादशाह जहाँगीर से भी संपर्क हुआ। अप्रैल 1621 ई. में आगरा में उसकी जहाँगीर से भेंट हुई। जहाँगीर ने प्रसन्न होकर उसे एक घोड़ा और एक हाथी पुरस्कार में दिया।
  • इस भेंट का उल्लेख ‘जहाँगीरनामा’ (तुजुक-ए-जहाँगीरी) में मिलता है। इसमें श्याम शाह का नाम ‘श्याम सिंह’ के रूप में मिलता है।
  • श्याम शाह के शासनकाल में जेसुइट पादरियों ने श्रीनगर की यात्रा की। वे मुख्यतः तिब्बत की यात्रा के दौरान गढ़वाल से होकर गुजरते थे। उनके यात्रा-विवरण श्याम शाह के समय के महत्वपूर्ण विदेशी स्रोत हैं।
  • अन्तोनियो दे आन्द्रोद को श्रीनगर पहुँचने वाला पहला जेसुइट पादरी बताया जाता है। वह 1624 ई. में श्रीनगर होते हुए तिब्बत गया तथा 1625 ई. में दो साथियों के साथ पुनः इसी मार्ग से तिब्बत गया।
  • जून 1631 ई. में तिब्बत की यात्रा के लिए भेजे गए जेसुइट दल में अजवेदो नामक पादरी भी शामिल था। जब यह दल श्रीनगर पहुँचा, तब श्याम शाह की मृत्यु हो चुकी थी।
  • पादरियों के यात्रा-विवरण के अनुसार श्रीनगर पहुँचने के समय श्याम शाह के अंतिम संस्कार की व्यवस्था चल रही थी और उसकी लगभग 60 रानियों के सती होने का उल्लेख मिलता है। पादरी दल उसके अंतिम संस्कार के बाद तिब्बत के लिए रवाना हुआ।
  • अजवेदो पादरी के विवरण के अनुसार श्याम शाह की मृत्यु अलकनंदा नदी में डूबने से हुई थी। उसके बाद उसकी लगभग 60 रानियों के सती होने का उल्लेख मिलता है।
  • इस प्रकार श्याम शाह के शासनकाल में सती प्रथा के प्रचलन का एक महत्वपूर्ण विदेशी विवरण प्राप्त होता है। यह घटना तत्कालीन सामाजिक और राजपरिवार की प्रथाओं के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
  • श्याम शाह का कोई पुत्र नहीं था, हालांकि कुछ परंपराओं में दुलाराम शाह को उसका पुत्र बताया गया है, जिसकी मृत्यु बचपन में ही हो गई थी। वहीं ‘रामायण प्रदीप’ तथा हर्षदेव रतूड़ी के अनुसार श्याम शाह का कोई पुत्र नहीं था। इसलिए इस विषय में स्रोतों में मतभेद है।
  • श्याम शाह को पहला परमार शासक माना जाता है जिसका चित्र उपलब्ध है। इसलिए उसका चित्र गढ़वाल के राजवंशीय इतिहास और कला-अध्ययन की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।
  • श्याम शाह के राजगुरु कवि शंकरदेव थे। उनके द्वारा ‘वास्तु शिरोमणि’ नामक ग्रंथ की रचना किए जाने का उल्लेख मिलता है।
  • श्याम शाह ने श्रीनगर में श्यामशाही/सामासाही बाग का निर्माण करवाया था। इससे उसके शासनकाल में उद्यान निर्माण और राजकीय स्थापत्य गतिविधियों का संकेत मिलता है।
  • श्याम शाह को कुछ इतिहासकारों ने विलासी राजा की उपमा भी दी है। उसके व्यक्तित्व के संबंध में स्वेच्छाचारिता, अहंकार और विलासिता जैसे विशेषणों का उल्लेख मिलता है।
  • देवलगढ़ के सत्यनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार 1626 ई. में हुआ। सत्यनाथ मंदिर के भित्तिलेख के अनुसार प्रभातनाथ पीर ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।

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